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कल्लो क्या कल्लोगे?

सवाल: साहित्य को किसने मारा?
जवाब: विचार ने मारा!
विचार की ओवरडोज से साहित्य मरणासन्न है।

हिंदी में कोई कुछ करे न करे, विचार जरूर करता है। पुराने पापी ऐसा करते तो कोई बात थी, लेकिन अब तो साहित्य की बाली उमर के लेखक भी विचार-व्याधि से पीड़ित दिखते हैं। किसी से पूछिए कि क्या कर रहा है, तो अल्पायु में ही गंभीर मुद्रा ओढ़कर कहता है कि विचार कर रहा है। पूछिए कि ‘विचार करना’ क्या पाठय़क्रम में लगा है? क्या तुङो कोई इम्तहान देना है? जवाब में वह विचार जैसा कुछ करने के बाद कहेगा कि पाठ्यक्रम में तो नहीं लगा, लेकिन साहित्य में विचार होता है, सब ऐसा करते आए हैं- इसलिए वह विचार करता है।

पूछिए कि साहित्य में ये तेरे खेलने-खाने की उम्र है, ऐसी कच्ची उम्र में ऐसा क्यों कर रहे हो? वह कहेगा कि सब कर रहे हैं, इसलिए वह भी कर रहा है। आप पूछिए कि अब तक जितना विचार कर लिया, उतना ही बता दे, तो वह कहेगा कि अभी मैं विचार कर रहा हूं। पूछें कि कब तक कर लेगा, तो कहेगा कि पता नहीं। हिंदी में ‘विचार बौर्राहट’ का रोग लग गया है। जिसे देखो, वही बौराया दिखता है।

दरअसल, ‘मुद्रास्फीति’ से ज्यादा खतरनाक यह ‘विचारस्फीति’ है! मुद्रास्फीति को तो कंट्रोल कर भी लें, लेकिन विचारस्फीति समेटे नहीं सिमटती! इतने विचार देखकर लगता है कि सारे प्लेटो, भर्तृहरि, नागाजरुन हिंदी में ही मौजूद हैं और इसी दिल्ली रहते हैं- वे इतना विचार करते रहते हैं कि उनके तोते तक विचारक होने-कहलाने लगते हैं- उनकी गली के कुत्ते भौंकते नहीं हैं, विचार करते रहते हैं। किसी को घर आने से मना करना होता है, तो पत्नी फोन पर ही कह देती हैं कि अभी तो वह विचार कर रहे हैं- शाम का पता नहीं। कूरियर वाला घंटी बजाने से पहले जोर से पूछता है कि कहीं वह विचार तो नहीं कर रहे हैं।

जापान, इंडोनेशिया, अंडमान, श्रीलंका में साल, दो साल में सुनामी आता होगा, लेकिन हिंदी में तो हर शहर में हर शाम आता रहता है। अखबारों में किसी न किसी गोष्ठी की सूचना छपती रहती है कि एक विचार गोष्ठी हो रही है, आप आएं। कई लोग अपने चेलों से फोन कराते हैं। चेला कहता है कि सर इस शाम हैबिटेट सेंटर में विचार करने वाले हैं, आप आ रहे हैं न? एक क्रांतिकारी किस्म के कवि एसएमएस के जरिये कहते हैं- हाय, फलां जगह आज विचार करने जा रहा हूं, आ रहे हो न! डियर विचार करने जा रहा हूं, आपके आने की प्रतीक्षा रहेगी! इतना विचार तो पिछले पांच हजार साल में न हुआ होगा। गोष्ठी होती है, तो संयोजक आकर कहता है कि अब फलां जी आपके सामने विचार रखेंगे। उनके जाते ही कहता है कि उन्होंने अभी-अभी आपके सामने अपने विचार रखे।

हिंदी में विचार एक जूता है, जिसे हर गोष्ठी में लेखक ‘रखकर’ चला जाता है या कि वह एक कमीज है, जिसे उतारकर रख जाता है। लेखक पहले ‘विचार करता’ है, फिर उसे ‘रखता’ है! जिसे सीधा वाक्य बनाने की तमीज नहीं है, वह ‘विचार रखकर’ चलता-बनता है- अंग्रेजी में विचार ‘पुट’ करते हैं, तो हिंदी वाले ‘रखते’ हैं- नकल के लिए अकल जरूरी कहां?

हिंदी में विचार ‘व्यक्त’ किए जाते थे- अब ‘रखे जाते’ हैं, जैसे खाना रखा जाता है। पंजाबी में रोटी डाली जाती है। दी नहीं जाती। कल को हिंदी में कहेंगे- उन्होंने अपने विचार डाले। जैसे भैंस ने पड्डा डालती है।
कल्लो क्या कल्लोगे?

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