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लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क

ऐसा लगता है कि यह फिल्म मल्टीप्लेक्स ऑडियंस को ध्यान में रख कर बनाई गई है। फिल्म की कहानी, लोकेशन और संवाद सब कुछ उसी के हिसाब से है। हीरो-हीरोइन के बीच कई संवाद अंग्रेजी में हैं। फ्रेंच का इस्तेमाल भी कई जगहों पर है, लेकिन उनका मतलब हिंदी में भी बताया गया है। लंदन में फिल्म मेकिंग का प्रशिक्षण लेने वाली अनु मेनन की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है और कहानी के चुनाव व उसके ट्रीटमेंट में पश्चिमी प्रभाव दिखता है। फिल्म का विषय परम्परागत भारतीय समाज के हिसाब से बोल्ड कहा जा सकता है। लिहाजा संवाद भी बोल्ड हैं। 

शुरुआत के दृश्यों को देख कर ऐसा लगता है कि यह फिल्म दर्शकों को केवल लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क की दृश्यात्मक सैर करने के लिए ही बनाई गई है और चूंकि यह फिल्म है, इसलिए उसमें कहने के लिए एक छोटी-सी प्रेम कहानी भी डाल दी गई है, पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे कहानी की परतें उभर कर आती जाती हैं। खासकर इंटरवल के बाद दिलचस्प मोड़ आता है।

यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जो थोड़ी गैर-परम्परागत है। इसकी एक खासियत यह भी है कि इसमें केवल दो ही कैरेक्टर हैं। मस्त स्वभाव का निखिल चोपड़ा (अली जफर) एक मुंबईया फिल्म प्रोड्यूसर का बेटा है, जो फिल्म मेकिंग की पढ़ाई करने के लिए लंदन जा रहा है। फेमिनिज्म में यकीन करने वाली ललिता कृष्णन (अदिति राव) एक ट्रेडिशनल मिडल क्लास परिवार से ताल्लुक रखने वाली लड़की है, जिसके पिता तमिल ब्राह्मण और मां महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण है। वह लंदन होते हुए न्यूयॉर्क जा रही है।

लंदन की फ्लाइट लेट होने की वजह से उसकी न्यूयॉर्क की फ्लाइट छूट जाती है। संयोग से उसकी मुलाकात निखिल से होती है और वह अगली फ्लाइट मिलने तक का समय बिताने के लिए निखिल के लंदन घूमने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है। इसी लंदन भ्रमण के दौरान दोनों में प्यार हो जाता है। फिर ललिता न्यूयॉर्क चली जाती है। निखिल उससे न्यूयॉर्क जाकर मिलने का वादा करता है, पर नहीं जाता। दो साल बाद दोनों पेरिस में मिलते हैं।

हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि ललिता नाराज हो जाती है और न्यूयॉर्क चली जाती है। चार-पांच साल बाद निखिल न्यूयॉर्क पहुंचता है ललिता से मिलने, जहां उसे पता चलता है कि ललिता की शादी एक अमेरिकी लड़के एलन से होने वाली है। अदिति राव क्यूट लगी हैं। उन्होंने अंग प्रदर्शन से भी परहेज नहीं किया है, पर उसमें वल्गैरिटी नहीं है। हिंदी में ये उनकी पहली फिल्म है। इस फिल्म में उन्होंने साबित किया है कि अगर लीड भूमिकाएं मिले तो वह बखूबी निभा सकती हैं।

अली जफर की फिल्म में कई भूमिकाएं हैं। वे हीरो हैं, फिल्म के गीत भी लिखे हैं, संगीत भी दिया है और गाने भी गाए हैं। गीतकार, संगीतकार और गायक के रूप में वे औसत रहे हैं, पर अभिनेता के रूप में प्रभावशाली हैं। किसी भी फिल्म का क्लाइमैक्स उसका हाई-प्वाइंट होता है। इस मामले में यह फिल्म थोड़ा पिछड़ती है। इसका क्लाइमैक्स आम बॉलीवुड फिल्मों की तरह काफी प्रत्याशित है। बहरहाल, हो सकता है कि आपके चेहरे पर तीव्र प्रशंसा के भाव न तैरें, पर निराशा के भी भाव नहीं आएंगे।

कलाकार: अली जफर, अदिति राव, दिलीप ताहिल (मेहमान भूमिका)
निर्माता: गोल्डी बहल, सृष्टि आर्या
निर्देशक: अनु मेनन
संगीत: अली जफर
गीत: अली जफर
डायलॉग: रितु भाटिया, अनु मेनन
राजीव रंजन

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