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सीरिया, ईरान पर फिसली विदेश नीति

यूपीए सरकार ने सीरिया के मामले में पलटी खाई है। 2011 के अक्तूबर में जब यूरोपीय संघ के देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सीरिया के खिलाफ और ज्यादा पाबंदियों की मांग करने वाला प्रस्ताव पेश किया था, तब भारत ने मतदान से खुद को अलग रखा था। रूस और चीन ने उस प्रस्ताव के खिलाफ अपने वीटो अधिकार का प्रयोग किया था। उसके तीन महीने के अंदर ही अब भारत ने पलटी मार ली है। इस बार उसने अरब लीग के प्रायोजित प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जिसमें सीरिया के खिलाफ लीबिया की तरह के हस्तक्षेप की बात की गई थी। इस प्रस्ताव को रूस और चीन के दोहरे वीटो ने निर्थक बना दिया। बहरहाल, इस बार भारत ने अमेरिका, उसके नाटो सहयोगियों और अमेरिका के वफादार अरब देशों के साथ वोट डाला।

सुरक्षा परिषद में इस प्रस्ताव के गिरने के बाद इसी तरह का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित कराया गया और यहां भी भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला। बेशक, यह प्रस्ताव ज्यादा प्रभावी नहीं होगा। अगर इसके बाद भी सीरिया के मामले में भारत के रुख में कोई अस्पष्टता बची रही हो, तो उसे भी तब दूर कर दिया गया, जब यूपीए सरकार ने 24 फरवरी को टय़ूनिस में हुई कथित ‘सीरिया के मित्र’ बैठक में हिस्सा लेने का फैसला किया।

पिछले साल के अक्तूबर के बाद से सीरिया के हालात ने खून-खराबे व टकराव का रूप ले लिया है। अमेरिका और सीरिया के किसी जमाने के औपनिवेशिक आका फ्रांस व ब्रिटेन, सऊदी अरब तथा कतर के साथ मिलकर सीरिया में निजाम बदलने के रास्ते पर चल रहे हैं और बशर अल असद की सरकार को गिराने के तरीके तलाश रहे हैं। उन्होंने सीरियाई राष्ट्रीय परिषद और मुक्त सीरियाई सेना का गठन किया है। नाटो उन्हें हथियार मुहैया करा रहा है और लीबियाई लड़ाकों को, जिनका लीबिया में काम पूरा हो चुका है, तुर्की में इश्केंदेरन पहुंचाया जा रहा है, जो सीरिया की सीमा से सटा हुआ है। पश्चिमी मीडिया, सीरिया में हो रही हिंसा की इकतरफा और विकृत तस्वीर पेश कर रहा है। इसके साथ ही वह बागियों के चरित्र को भी ढकने की कोशिश कर रहा है, जो सबसे बढ़कर मुस्लिम ब्रदरहुड तथा और भी उग्र इस्लामी गुटों से आए हैं।

अल कायदा ने इस बगावत के लिए अपने समर्थन का एलान कर दिया है, क्योंकि सीरिया की वर्तमान सरकार आज अरब दुनिया का इकलौता धर्मनिरपेक्ष निजाम है। सीरियाई निजाम की तानाशाही की पश्चिम की निंदा का पाखंड इस तथ्य से उजागर हो जाता है कि वह सीरिया को निशाना बनाने के लिए ही तानाशाही वाले सऊदी निजाम तथा खाड़ी के अन्य तानाशाहीपूर्ण निजामों का बेहद चतुराई से इस्तेमाल कर रहा है।

सीरिया में इस समय चल रहा संघर्ष स्थानीय मामला नहीं है। यह तो एक वृहत्तर भू-राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा है, जिसके निशाने पर ईरान है और जिसका मकसद पश्चिम एशिया पर साम्राज्यवादी शक्तियों का प्रभुत्व तथा उसके तेल संसाधनों पर इन ताकतों का नियंत्रण बनाए रखना है। अमेरिका तथा नाटो के उसके सहयोगी सीरिया में निजाम बदलना चाहते हैं, ताकि ईरान के साथ उसके करीबी रिश्तों को खत्म कर सकें। यही इजरायल के भी हित में होगा। सऊदी अरब, सीरिया के असद निजाम के उखाड़े जाने को सीरिया को सुन्नी वहाबी प्रभाव के दायरे में खींचने और शियावादी ईरान को अलग-थलग करने की दिशा में एक बड़े कदम की तरह देखता है।

इससे पहले भारत ने सुरक्षा परिषद में लीबिया के मुद्दे पर सही रुख अपनाया था। नाटो शक्तियों और कतर जैसे उनके दुमछल्लों द्वारा जिस तरह सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का लीबिया के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था, उसे देखने के बाद भारत के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह सीरिया के सिलसिले में बेशर्म ताकतों के तेल के षड्यंत्रों से खुद को दूर रखे। लेकिन 2011 के अक्तूबर में अपनाए गए रुख के पलटे जाने को सीधे-सीधे अमेरिकी दबाव से जोड़ा जा सकता है। यह ईरान के संबंध में भारतीय रुख में भी प्रकट होता जा रहा है।

अमेरिका चाहता है कि ईरान को अलग-थलग करने और अंतत: वहां निजाम बदलवाने के उसके सतत प्रयासों के साथ भारत हो जाए। भारत पर बराबर इसके लिए दबाव डाला जा रहा है कि वह ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे और उसके साथ अपने व्यापारिक व आर्थिक रिश्ते तोड़ दे। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता ने खासतौर पर भारत तथा चीन का जिक्र करते हुए 21 फरवरी को यह बताया था कि ‘हमारी सरकार इन अपेक्षाओं के संबंध में कि (ये) देश ईरानी तेल पर निर्भरता से ज्यादा से ज्यादा दूर हटते जाएं... बातचीत कर रही है।’

जब भारत ने इसका एलान किया था कि वह ईरान से तेल खरीदना जारी रखेगा, तो अमेरिका के विदेश विभाग के पूर्व अंडर-सेक्रेटरी निकोलस बर्न्‍स ने, जिन्हें भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदे में उनकी भूमिका के लिए खासतौर पर जाना जाता है, एक लेख में लिखा था कि भारत का यह फैसला, ‘अमेरिका के मुंह पर तमाचा ही नहीं है, इससे उसके नेतृत्व की क्षमता के संबंध में भी सवाल उठ खड़े होते हैं।’

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के इस आशय के वक्तव्य के बावजूद कि भारत आगे भी ईरान से तेल खरीदता रहेगा, चोरी-छिपे ईरान से तेल के आयात में कमी लाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ईरान से हमारा तेल का आयात, 2008-09 के दो करोड़ 18 लाख टन के स्तर से घटकर साल 2010-11 में एक  करोड़ 80 लाख टन रह गया था। वर्तमान वित्त वर्ष में यह और भी घटकर एक करोड़ 31 लाख टन हो गया है। तेल मंत्रलय ने सरकारी तेल कंपनियों के लिए निर्देश जारी कर दिए हैं कि तेल के दूसरे स्रोतों की तलाश करें। 

अमेरिका की सलाह पर चलते हुए भारत पहले ही सऊदी अरब से तेल आयात बढ़ाने के लिए बात कर चुका है। भारत चुपके-चुपके ईरान के लिए अपने निर्यात का भी गला दबा रहा है।

सीरिया प्रकरण और ईरान के मामले में पांव पीछे खींचे जाने से भारत की विदेश नीति की असलियत एक बार फिर बेपरदा हो गई है। भारत की विदेश नीति अब प्रबुद्ध राष्ट्रीय हितों पर आधारित स्वतंत्र नीति नहीं रह गई है। अब यह साम्राज्यवादी दबावों व भू-राजनीतिक स्वार्थों के सामने घुटने टेकने वाली विदेश नीति बन गई है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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