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इस ऊब के मायने क्या हैं

वह उखड़े हुए क्यों रहते हैं? ऑफिस में मन ही नहीं लगता। काम निबटाने के अंदाज में होता है। पूरी जिंदगी एक रूटीन-सी बनकर रह गई है। उसमें कोई मजा ही नहीं रहा।

काम में जब कोई चुनौती नहीं रह गई हो, तो उबाऊपन हावी होने लगता है। इसीलिए डॉ. रोनाल्ड ई रिगियो का कहना है कि तब हमें बदलाव की जरूरत होती है। जरूरी है कि हम काम निपटाने की बजाय उसके मायने तलाशने की कोशिश करें। वह क्रेविस इंस्टीटय़ूट ऑफ लीडरशिप के डायरेक्टर रह चुके हैं। फिलहाल वहां प्रोफेसर हैं। उनकी कई किताबों में हाल ही में आई ‘लीडरशिप स्टडीज’ की खूब चर्चा हुई है। जिंदगी जीने के लिए चुनौती बेहद जरूरी है। उसके बिना पूरी जिंदगी ही बेमानी लगने लगती है। हम चाहकर भी बेमानी जिंदगी नहीं चाहते। शायद इसीलिए हमें जैसे ही उसके बेमानी होने का अहसास होता है, हमारी जिंदगी बदलने लगती है।

हमारे साथ कुछ अजीब-सा घटता है। हम अपनी जिंदगी में ठहराव चाहते हैं। और जब जिंदगी सचमुच ठहर जाती है, तो हम ऊबने लगते हैं। तब हम बदलाव चाहते हैं। लेकिन जो भी हमारे पास है, उसे गंवाना नहीं चाहते। आमतौर पर ऊबने का एक तय मतलब होता है। यानी हम ऐसे दौर में हैं, जहां हमारे पास कुछ है। हम उसे गंवाना नहीं चाहते। लेकिन बदलाव भी चाहते हैं। ऐसा बदलाव, जो आराम से हो जाए। और आराम से बदलाव होता नहीं है। या कम से कम हमारे मुताबिक नहीं होता। यों अच्छा हो या बुरा, बदलाव अक्सर हमारे मुताबिक नहीं होता।
हम ऊबने के दौर में चले जाते हैं। दरअसल, हम जो बदलाव चाहते हैं, उसके लिए जमकर काम नहीं करते। और जो बदलाव हम तक चला आता है, वह हमें रास नहीं आता। जिंदगी लगातार बदलाव चाहती है। सो, अपने को लगातार बदलना भी एक चुनौती है।
राजीव कटारा

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