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सड़ता हुआ अनाज

बेगूसराय में गरीबों का दाना बना कीड़ों का निवाला। यह समाचार भले ही विपक्षियों के लिए घर बैठे मुद्दा बन गया हो, लेकिन इसमें सरकारी अफसर की उदारता साफ झलकती है। आज तक जितनी भी सरकारें बनीं, सभी गरीबों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध रहीं। गरीबी न हो, तो मानो सरकार के पास हटाने के लिए कुछ बचता ही नहीं। चाहे राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार। गरीबी दूर करने के लिए लोक-लुभावन योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनके नाम भी लुभाते हैं, काम तो खैर सुहाते ही हैं।

लेकिन कोई भी सरकार ऐसी नहीं कि गरीब-लाचार कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, सांप-बिच्छू की खातिर सोचे। योजनाओं में अगर पशु-पक्षी शामिल भी हैं, तो कीड़े-मकोड़ों के लिए अलग से न कोई योजना है और न ही सपना। इसलिए यह सहृदयता दिखाई है बिहार राज्य खाद्य निगम ने। बेगूसराय से सटे तिलरथ में एससीआई के गोदाम में गरीबों के लिए रखा गया 25 क्विंटल गेहूं सड़ गया। सड़ा इसलिए कि गोदाम पिछले आठ महीने से खोला नहीं गया। खोला इसलिए नहीं गया, क्योंकि उस पर ताला लटक रहा था। ताला नहीं खुला, क्योंकि गोदाम में तकरीबन 50 हजार बोरे गेहूं को सड़ना था। सड़ना इसलिए था कि उसे सड़ना था। अब कितना सड़ा और कितना नहीं, यह जांच के बाद पता चलेगा। सरकारी जांच की अपनी रफ्तार होती है। तब तक सड़ने की प्रक्रिया जारी रहेगी और कीड़े अंत्योदय, अन्नपूर्णा, बीपीएल तथा एपीएल सहित अन्य योजनाओं के लाभधारकों के हिस्से चट करने का सुअवसर प्राप्त करते रहेंगे।
लेखक मंच में वीरेंद्र नारायण

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