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अफवाह के पैर

एक सनसनीखेज खबर उड़ी और कुछ समय के लिए उसने देश के रक्षा प्रतिष्ठान को सकते में डाल दिया, हालांकि बाद में उसे गलत पाया गया। खबर यह थी कि रक्षा मंत्री ए के एंटोनी के दफ्तर में इलेक्ट्रॉनिक जासूसी हो रही है। दरअसल, रक्षा मंत्री की टेलीफोन लाइनों की जांच कर रहे दो फौजी अफसरों ने उनमें कुछ अजनबी सिग्नल खोज निकाले, जिससे यह लगा कि शायद रक्षा मंत्री के टेलीफोन ‘बग’ किए जा रहे हैं। बाद में आईबी के विशेषज्ञों ने जांच करके बताया कि वे सिग्नल महत्वपूर्ण नहीं थे और किसी किस्म की जासूसी की वजह से नहीं थे। इस खुलासे से एक बड़ा कांड टल गया।

पिछले वर्ष वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के कमरे की जासूसी की खबर ने हड़कंप मचा दिया था। खबर यह थी कि उनके कमरे में कुछ चिपकाने वाले पदार्थ मिले हैं, जिनसे यह शक हुआ कि इनके जरिये जासूसी करने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चिपकाए गए होंगे। इस मामले को लेकर वित्त मंत्री और गृह मंत्री के बीच विवाद की भी खबरें आ गई थीं। रक्षा मंत्री की जासूसी का मामला और ज्यादा विस्फोटक हो सकता था, आखिरकार देश की रक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें इससे उजागर हो सकती थीं और यह संदेश जा सकता था कि जब जासूसी करने वाले रक्षा मंत्री के दफ्तर तक पहुंच सकते हैं, तो देश की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।

इस बीच एक बहुत नाजुक मसला पिछले दिनों थल सेनाध्यक्ष वी के सिंह की जन्मतिथि को लेकर हुआ विवाद भी है। इस मामले में रक्षा मंत्रलय के प्रशासनिक अधिकारियों और सैन्य अधिकारियों के बीच तनातनी की खबरें भी आईं। यूं तो पूरी दुनिया में सैन्य और असैन्य अधिकारियों के बीच संबंध बहुत मधुर नहीं होते और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। सैनिक अधिकारी सोचते हैं कि असैन्य अधिकारी रक्षा मामलों में कुछ नहीं जानते, फिर भी अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं। उधर असैन्य अधिकारियों का मानना है कि लोकतंत्र में सेना नागरिक प्रशासन के तहत होती है, इसलिए फैसले असैन्य स्तर पर ही लिए जा सकते हैं।

रक्षा मंत्री काफी परिपक्व और नाप-तौलकर बात करने वाले व्यक्ति हैं, लेकिन अधिकारियों के बीच अविश्वास इस हद तक है कि असैनिक अधिकारियों ने सैनिक अधिकारियों से अपनी टेलीफोन लाइनों की जांच तक करवाने से मना कर दिया। ऐसे में, अगर यह अफवाह चलती, तो इसके भले ही पैर न होते, लेकिन पंख जरूर लग जाते और तरह-तरह की षड्यंत्र कथाएं चलने लगतीं, जिनकी राजनीति में कोई कमी नहीं है।

कुछ अफवाहें तो फिर भी चलेंगी ही, क्योंकि यह मान लिया जाएगा कि जरूर कोई बात छिपाई गई है या लीपापोती हो रही है। शायद इसलिए कि हमारा प्रशासनिक तंत्र गोपनीयता में कुछ ज्यादा भरोसा करता है। हमारे प्रशासन तंत्र की बुनियादी समझ अंग्रेजों के जमाने की है, जब जनता को शासित माना जाता था और उसे सिर्फ जरूरी सूचनाएं ही दी जाती थीं। सूचना के अधिकार के कानून का जैसा विरोध हुआ, वह इसी बात को दिखाता है। रक्षा मामलों में यह गोपनीयता ज्यादा होती है।

तमाम देशों में एक निश्चित वक्त के बाद तमाम सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक हो जाते हैं, अमेरिका में वियतनाम युद्ध या उसके बाद तक के दस्तावेज सार्वजनिक हैं, जबकि भारत-चीन युद्ध को पचास वर्ष होने को आए हैं, उसमें मिली हार के कारणों की जांच करने वाले ब्रूक-हेंडरसन आयोग की रपट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, जबकि भारत में रक्षा नीति का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों के लिए वह बहुमूल्य हो सकती है। ऐसी गोपनीयता की वजह से ही षड्यंत्रों की रहस्य कथाएं लोकप्रिय होती हैं। अगर सरकार सूचनाओं के मामले में उदार हो, तो उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

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