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यमन में नई शुरुआत

दुनिया के सबसे गरीब मुल्कों में से एक और अल-कायदा के मजबूत किले के रूप में बदनाम यमन को आखिरकार एक नया रहनुमा मिल गया। पिछले हफ्ते उप-राष्ट्रपति अब्द रब्बो मंसूर हादी ने यमन के नए सदर के तौर शपथ ली। इस शपथ ग्रहण समारोह के बाद यह बिल्कुल साफ हो गया कि अली अब्दुल्ला सालेह के शासन का औपचारिक रूप से अंत हो चुका है। सालेह सत्ता छोड़ना नहीं चाहते थे और तीन बार वह अपने वायदे से मुकर चुके थे। लेकिन विपक्ष की जागरूकता और पड़ोसी देशों ने उनके लिए और कोई रास्ता नहीं छोड़ा था।

सालेह की सत्ता से बेदखली निश्चित तौर पर यमन के लिए सुकून भरी बात है- आखिर उनके दौर में इस मुल्क ने सड़कों पर भारी खून-खराबा देखा। लाखों की तादाद में लोग सालेह की हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। हालांकि सालेह दावा करते हैं कि उन्होंने 33 वर्षो तक अपने मुल्क की खिदमत की है। बहरहाल, वह इस मायने में खुशकिस्मत हैं कि उनके व विपक्ष के बीच सत्ता हस्तांतरण के लिए मध्यस्थता करने वाली गल्फ कोऑपरेशन कौंसिल ने उनके लिए सुरक्षित स्थिति पक्की करा दी। यानी उन्हें उस नियति से दो-चार नहीं होना पड़ेगा, जिससे मिस्र के पूर्व तानाशाह हुस्नी मुबारक की मुलाकात हो रही है।

यमन में सत्ता का हस्तांतरण सहज तरीके से हुआ है। साना से आने वाली खबरें बताती हैं कि यमन में आंदोलन की अगुवाई करने वाले नौजवान अब आंतरिक विभाजन के शिकार बनने लगे हैं, क्योंकि बदले हुए माहौल में अलग-अलग दृष्टिकोण उनकी स्थिति को कमजोर बना रहा है। ऐसे में, यदि नए सदर ने संतोषजनक प्रदर्शन किया, तो विपक्ष पूरी तरह से पस्त हो जाएगा। बहरहाल, यमन को इस वक्त विश्व बिरादरी के सहयोग की जरूरत है। नई हुकूमत के आगे काफी मुश्किल चुनौतियां हैं: इसे न सिर्फ यमन में स्थायित्व लाना होगा, बल्कि देश की माली हालत को भी नए सिरे से खड़ा करना होगा। साथ ही उसे अपने वायदे के मुताबिक यमन में जम्हूरियत की जड़ें मजबूत बनानी होंगी और अल कायदा के शिविरों को नेस्तनाबूद करने के साथ-साथ उसे कबाइली लागों का भरोसा भी जीतना होगा।
द पेनिनसुला, कतर

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