DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

वसंत का जलवा हब्शी हलवा

पुरानी दिल्ली को राजधानी का फूड कोर्ट कहा जाए तो गलत न होगा। यूं तो लोग प्राय: पुरानी दिल्ली आते हुए कतराते हैं, क्योंकि यहां पर खासी भीड़-भाड़ होती है और पैदल चलना तक दुश्वार होता है, मगर जहां तक स्वादिष्ट, खुशबूदार, मुंह में पानी भर देने वाले और भूख बढ़ा देने वाले खाने का संबंध है, उसमें पुरानी दिल्ली का जवाब नहीं। यूं तो यहां के अनेक व्यंजन मशहूर हैं, पर चांदनी चौक, बल्लीमारान, हवेली हिसामुद्दीन हैदर में एक विशेष प्रकार का हब्शी हलवा मिलता है जिसकी धूम बड़ी दूर-दूर तक है।

अरबी भाषा में ‘हब्शी’ का अर्थ होता है-‘हब्शा’ अर्थात् अफ्रीका का निवासी। मगर इस हलवे का अफ्रीका से कोई संबंध नहीं, सिवाए इसके कि इसका रंग अफ्रीकी नागरिकों की तरह गाढ़ा कत्थई होता है। हां, इसका दूसरा अर्थ यह होता है कि जिस प्रकार से एक अफ्रीकी ताकतवर होता है, उसी प्रकार की एनर्जी यह हलवा भी खाने वाले को प्रदान करता है। पुरानी दिल्ली के बुजुर्ग इस हलवे को विशेष रूप से नौजवानों को खाने की सलाह देते हैं।
आजकल बाजार बल्लीमारान की हवेली हिसामुद्दीन हैदर मुहल्ले में इस हलवे को उस क्षेत्र के जाने-माने स्वर्गीय हनीफ दूध वाले के पुत्र फिरोज अहमद द्वारा बनाया जाता है। चूंकि इसमें शरीर को शक्ति देने वाले मेवे और दूध का मिश्रण होता है, इसलिए इसे अक्तूबर से मार्च के बीच तैयार किया जाता है। गोल-गोल गुम्बद के आकार की टिकियों वाला यह हलवा इतना खुशबूदार होता है कि व्यक्ति दूर से ही इसकी ओर खिंचा चला आता है। स्वादिष्ट इतना कि  दिल चाहता है, खाते ही चले जाओ।

वैसे एक व्यक्ति के लिए एक ही टिकिया, जो कि 100 ग्राम की होती है, काफी है। यह हलवा 320 रुपए प्रति किलो मिलता है। जो मुख्य पदार्थ इस हलवे में इस्तेमाल होते हैं, उनमें दादरी, धनकौर और सिकन्दराबाद से मंगाया गया दूध भी है, जो उत्तरी भारत में सबसे बढ़िया माना जाता है। इसके अलावा इसमें होता है मैदा, चीनी, समनक, जाफरान, खालिस देसी घी, बादाम (गुरबंदी तेल वाले), पिस्ता, काजू आदि। फिरोज इसे अपने हवेलीनुमा मकान के आंगन में ही तैयार करते हैं। एक बहुत बड़ी कढ़ाई में दूध डाल कर इसे तैयार किया जाता है और केवल लकड़ियों की आग पर ही इसे पकाया जाता है। आग समय-समय पर आवश्यकतानुसार हल्की या तेज की जाती है। फिरोज कहते हैं कि लकड़ी की आग में कुछ ऐसा होता है कि इस हलवे का स्वाद बढ़ जाता है।

1947 से चल रहे इस कारोबार के संबंध में फिरोज ने बताया कि एक समय उनका बनाया गाजर का हलवा इतना लोकप्रिय हुआ कि जो लोग विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए, वे आज भी अपने सगे-संबंधियों या मित्रों से गुजारिश करते हैं कि मुनासिब हो तो हनीफ का गाजर का हलवा जरूर ले आना।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:वसंत का जलवा हब्शी हलवा