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जगे तो रहें

अपने अधिकांश नेताओं की नींद तब खुलती है जब चुनाव की घोषणा बस होने ही वाली हो। यह तब है जबकि पार्षद से लेकर सांसद तक को विकास कार्यों के लिए हर साल की राशि निर्धारित है। अब दिल्ली के अपने पार्षदों को ही लीजिए। उन्हें मालूम था कि उनका कार्यकाल समाप्त होने को है और चुनाव की घोषणा कभी भी हो सकती है। पर वे इंतजार करते रहे कि अधिसूचना जारी होने का समय एकदम सिर पर आ जाए। साल भर काम हो, तो जनता को कोई दिक्कत ही क्यों हो और किसी नेता को अपनी हार की आशंका क्यों सताए?

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