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अब भी बरकरार हैं उम्मीदें

गुजरात में आए नफरत के विध्वंसक तूफान के दस वर्ष पूरे हो गए। उस दुखदायी बवंडर ने दो हजार से अधिक जानें लील ली थीं और अनगिनत जिंदगियों को हमेशा के लिए तबाह कर दिया था। वह एक ऐसा पल था, जिसने हिन्दुस्तान के असंख्य लोगों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया, उनमें से एक मैं भी हूं।

इन पिछले दस वर्षों को मैं पीड़ा और गुस्से के साथ याद करता रहा हूं, लेकिन इनके साथ ही मेरी उम्मीदें भी मजबूत होती गई हैं। दस साल पहले बतौर प्रशासनिक अधिकारी मैंने गुजरात में हुए बर्बर कत्लेआम और उस वक्त वहां तैनात अपने सहयोगी प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की भूमिका के बारे में तथा राज्य द्वारा पीड़ितों के लिए शरणार्थी शिविर तक बनाने से इनकार करने के साथ-साथ नफरत की सियासत पर काफी व्यथा के साथ लिखा था। आज भी वे दर्द कायम हैं और इसके लिए नरसंहार के बाद के इन दस वर्षो की नाकामियां जिम्मेदार हैं।

इन नाकामियों में मेल-मिलाप व उदारता को विस्तार देने में मिली सामाजिक विफलता, पीड़ितों को न्याय न दिला पाने की न्यायिक असफलता और इस कांड के लिए जिम्मेदार लोगों की लोकतांत्रिक जवाबदारी तय करने में मिली राजनीतिक नाकामी शामिल हैं। जो लोग सामूहिक अपराधों के लिए जिम्मेदार रहे, वे आज भी सलाखों से दूर हैं। मुझे बेहद अफसोस होता है, जब उद्योगपति, राजनेता, बल्कि सामाजिक आंदोलनों के नेता भी गुजरात में सुशासन का गुणगान करते हैं। उनका दावा है कि आर्थिक तरक्की, प्रशासनिक दक्षता और कथित वित्तीय ईमानदारी इस सूबे की बड़ी तस्वीर पेश करती हैं, जो नरसंहार से जुड़ी इसकी तस्वीर को महत्वहीन बना देगी।

गुजरात दंगे के शिकार लोगों में से एक भी शख्स मुझे ऐसा नहीं मिला, जो दंगों से पहले के अपने जीवन-स्तर को दोबारा हासिल कर पाया हो। वे आज भी उस जिंदगी को याद कर तिल-तिल मरते हैं। इन लोगों को इस बात की टीस हर पल है कि उस मनहूस हादसे ने उनसे जो कुछ छीन लिया है, वह उन्हें अब कभी नहीं मिलेगा। दस साल पहले हत्यारी भीड़ के भय से अपने धधकते आशियाने को छोड़कर भागे दो लाख लोगों में से आधे तो दोबारा अपनी जन्मभूमि की ओर रुख भी नहीं कर सकते। पूरे के पूरे गांव अब बदल चुके हैं।

करीब 30,000 लोगों के लिए तो उस वक्त बनाए गए अस्थायी शरणार्थी शिविर ही अब स्थायी रिहाइश में तब्दील हो चुके हैं। ये शिविर मुख्यत: मुस्लिम संगठनों ने छोटी-छोटी कोठरियों में बनाए थे। जो मुसलमान इस हैसियत में थे कि वे इन शिविरों से निकल सकें, वे सुरक्षित मुस्लिम बस्तियों में जा बसे। ऐसे लोग अपनी जमीनें औने-पौने दाम पर अपने बहुसंख्यक पड़ोसियों को बेचने के लिए बाध्य थे। बहरहाल, राज्य प्रशासन का रवैया इन बस्तियों के प्रति बेहद दुर्भावनापूर्ण है। वह इनमें पीने के पानी, सड़क, बिजली और जल-निकासी जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में भेदभाव बरतता है।

जो लोग अपने घर लौट सके हैं, वे उस हादसे के बाद से ही बेहद अलग-थलग और गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं। ऐसे लोग दोयम दर्जे के नागरिक की तरह अपने दिन गुजार रहे हैं, जिनका पड़ोसियों से कोई खास राफ्ता नहीं है। उन्हें जीने-मरने के रस्मो-रिवाज से दूर रखा जा रहा है। ऐसे लोगों को काम पर भी तभी रखा जाता है, जब कोई दूसरा नहीं मिलता। ये लोग उपेक्षा और तिरस्कार की एक दर्द भरी जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के संघर्ष में इन्होंने खुद को झोंक दिया है।

गुजरात के दंगा पीड़ितों के जख्म भर सकते हैं, यदि उन जख्मों पर पश्चाताप और इंसाफ की मरहम लगाई जाएं। लेकिन इन दस वर्षो में एक बार भी इस संहार के लिए माफी नहीं मांगी गई। बल्कि खाकी वरदी वाले जिस एक शख्स को राज्य सरकार ने दंडित किया है, वह दरअसल उस जमात में शामिल हैं, जो जमात साहस के साथ न्याय की जंग लड़ रही है। एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में मैंने कई दंगों का सामना किया है और मैं यह कह सकता हूं कि कोई भी दंगा राजनीतिक व प्रशासनिक नेतृत्व की मर्जी के विरुद्ध दिन तो क्या, चंद घंटे भी जारी नहीं रह सकता।

हममें से अनेक लोगों ने इन बीते वर्षो में दंगे में बचे उन लोगों का साथ देने का फैसला किया, जो मुल्क की अदालतों में इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बावजूद इसके ज्यादातर आपराधिक मुकदमे धराशायी हो गए और सामूहिक नरसंहार, बलात्कार और आगजनी करने के आरोपी खुले घूम रहे हैं। सांप्रदायिक हिंसा के मामले में सजा न मिलना आज भी एक बड़ी चुनौती है। दरअसल, ऐसे मुकदमों में पुलिस की जांच बेहद लापरवाही भरी होती है, जबकि सरकारी वकील का रवैया बचाव पक्ष के अधिवक्ता की तरह होता है। गवाहों व शिकायतकर्ताओं को खुलेआम धमकाया जाता है, कई बार तो अदालतों के गलियारे में उन्हें डराया जाता है।

दूसरी तरफ, गोधरा में ट्रेन की बॉगी में आग लगाने के आरोपी इन दस में से नौ साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहे, जब तक कि उन्हें सुबूतों के अभाव में अदालत ने बरी नहीं कर दिया। बिना गुनाह के नौ साल तक जेल में रखे जाने के बाद उनकी, उनके परिवार की जिंदगी और उनके जज्बात पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। फिर भी वे शायद उन लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा खुशकिस्मत हैं, जिन्हें फर्जी मुठभेड़ों में मार डाला गया।

इन सबके बावजूद पिछले दस वर्षों के मुकाबले आज मेरी उम्मीदें कहीं अधिक पुख्ता हैं। इस देश के लोगों ने यह साबित किया है कि उन्हें नफरत की सियासत पसंद नहीं है, हालांकि गुजरात में ऐसा नहीं हो सका है। हिंसा और दशहत के उन दिनों में भी जितने बलवाइयों ने जिंदगियों को रौंदा था, उनसे कहीं ज्यादा नागरिकों ने बेबस लोगों को पनाह दी थी। गुजरात की धरती अब भी नायकों से भरी पड़ी है। पुलिस अधिकारियों, पत्रकारों, लेखकों, कलाकारों, जजों और अमन व न्याय के पैरोकारों ने इन दस वर्षों में घृणा और अन्याय के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा लिया है। और उनमें से ज्यादातर उस समुदाय से नहीं आते, जो दंगाइयों के निशाने पर था। इनमें से हर एक शख्स निजी तौर पर कीमत चुकाने के बावजूद हमारे संविधान व मानवता की रक्षा में बेखौफ खड़ा रहा है और इन्हीं की बदौलत मेरी उम्मीदें बरकरार हैं, बल्कि मजबूत हुई हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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