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अगर जुड़ी नदियां तो दांव पर होगा बहुत कुछ

नदियों को जोड़ने की महापरियोजना पर काम शुरू करने को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी है।  पर यह अभूतपूर्व योजना बहुत आसान नहीं है और इसमें अजीब किस्म की पेचीदगियां हैं। इससे इनकार नहीं कि हमें पानी का दोहन करना होगा, किंतु यह दोहन किस कीमत पर हो, इस सवाल के ठोस जवाब सामने नहीं आ रहे।

इस योजना में 30 लिंक यानी तीस विशाल नहरें प्रस्तावित हैं और करीब 40 बांध। फिर हिमालयी पट्टी से लेकर दक्षिण भारत में कृष्णा, गोदावरी, कावेरी तक का क्षेत्र। एक नदी का पानी दूसरी में और इस तरह सबको बराबर पानी, हमेशा पानी और दुख-अड़चनें दूर। लेकिन बात इतनी उम्मीद भरी होती, तो क्या हर्ज था। बात यह है कि इस महापरियोजना से अकल्पनीय रूप से विस्थापन का अंदेशा भी है, नदियों के किनारे बड़े पैमाने पर उलट-पुलट जाएंगे। उन जलक्षेत्रों की इकोलॉजी पर खतरा मंडराने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। शुरुआती अनुमान यही है कि हजार से ज्यादा गांव डूबेंगे व करीब पांच लाख की आबादी दर-बदर हो जाएगी। इस तरह के जलप्लावन से विस्थापन और पलायन सिर्फ भूगोल से कटना ही नहीं होता, बल्कि इसके न जाने कितने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आयाम होते हैं।

इन पर्यावरणीय और सामाजिक- सांस्कृतिक आपदाओं के अलावा इस योजना से देश के भीतर राज्यों की तथा पड़ोसी देशों के साथ सामरिक मुश्किलें भी जुड़ी हैं। बांग्लादेश, भूटान और नेपाल इस परियोजना को लेकर आशंकित हैं। उन्हें डर है कि नदियों की इस लड़ी से तैयार जलप्रवाह अपस्ट्रीम में मौसमी या पर्यावरणीय तबाहियां ला सकता है। अभी तक इन पड़ोसियों को भरोसे में लेने की कोशिश नहीं की गई है। समान जलराशि का वितरण राज्यों के बीच कैसे होगा, अभी यह सुनिश्चित नहीं हो पाया है। पहले ही केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्य इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं। कृष्णा-पेन्नार लिंक या पेन्नार-कावेरी लिंक इन राज्यों में पानी की कमी से ज्यादा पानी की राजनीति का पटाक्षेप कर देगा, या फिर कोई नया रूप ले लेगा।

क्या पानी की जरूरतों व समस्याओं को लेकर इस विशाल परियोजना के अलावा कोई और तरीका नहीं हो सकता? वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों में इसे लेकर बहस है। बहस यह भी है कि मदर ऑफ ऑल प्रोजेक्ट्स कही जा रही इस परियोजना में कितने बड़े पैमाने पर निवेश, निर्माण और विध्वंस होंगे और उनके ठेके लेने को कौन-कौन आएंगे। कौन आगे होंगे, कौन पीछे रह जाएंगे और सरकारी, अर्धसरकारी, भागीदारी वाली या विशुद्ध कॉरपोरेट होड़ क्या रंग दिखाएगी? इन तमाम पेचीदगियों से कैसे निपटा जाएगा? एनजीओ तंत्र भी नए तरीके से सक्रिय हो जाएगा। क्या यह सब देश में एक बड़ी उथल-पुथल का कारण नहीं बनेगा? हालांकि पानी के अलावा बाकी क्षेत्रों में तो ऐसा ही माहौल है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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