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एक हमारा कटोरा, एक तुम्हारा कटोरा

वैसे मंदिर और भिखारी का संबंध चोली-दामन का साथ है। बिना दान-पुण्य के ‘दर्शन-मन्नत’ का कोई अर्थ नहीं है। एक दिन अखबार में सुझाव पढ़ा- मंदिरों की करोड़ों-अरबों की प्रति वर्ष आमदनी होती है। वह धन एक-एक कारखाने में लगे, तो बेकारी दूर होगी। स्वस्थ भिखारी को तो श्रमिक का काम दे ही दिया जाना चाहिए। एक मंदिर ने इस सुझाव को मान लिया।

प्रशासक ने सरकार से अनुमति लेकर शुभस्य शीघ्रम कारखाना स्थापित कर दिया। श्रमिक नहीं मिले, तो उसने मंदिर के आसपास के लोगों को घेरा और कारखाने में ले जाकर छोड़ा। लोग दूसरे दिन से आए नहीं और न मंदिर के आसपास ही फटके, वे गिरजे व मस्जिद के निकट जमा हो गए। वहां भी कारखाने के सुपरवाइजर पहुंचे। संयोग से मेरा गुजरना वहां से हुआ, तो आंखों देखा हाल प्रस्तुत है:

सुपरवाइजर- चलिए स्वाभिमान से जीने के लिए राम की जय बोलो। मंदी के दौर में भी आप सबको रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं। यह भारतीय प्रयास है। आप लोग भी भारतीयता का परिचय दें। ऐसा न हो कि विदेशी सैलानी भिखारियों को देखें और देश का सिर नीचा हो।
एक भिखारी सामने तनकर खड़ा हो गया। सुपरवाइजर पीछे हट गए। वह ऊंचे स्वर में बोला- श्रीमान सरकार, आप क्या रोजगार देते हैं? भीख तो हमारा मूल रोजगार है। साइड में दूसरा भी। इस पर पूछा- दूसरा क्या? भिखारी ने कहा- ब्याज पर पैसा कारोबारियों को दे रखा है। कई तो हमारी पूंजी से कुटीर उद्योग चला रहे हैं।

सुपरवाइजर ने सरकार को इस बाबत पत्र लिख भेजा। सरकार का दूसरा प्रतिनिधि उसी जैसे भिखारी से टकराया। वह फूट पड़ा- यह सरकार को शोभा नहीं देता है। हमारी प्रदेश सरकार कभी केंद्र सरकार, तो कभी विदेश में रह रहे अप्रवासियों से भीख मांगती दिखाई देती है। बड़े कारोबारी को यह शोभा नहीं देता कि वह छोटों के पेट पर इस तरह लात मारे। जहां तक धार्मिक भावनाओं का फायदा उठाने की बात है, तो चुनाव के दिनों में आप सब भी तो यही करते हो।

बात पते की थी। मंत्री के पास रिपोर्ट पहुंची, तो मंदिर के कारखाने को ठेके पर देने का फैसला हो गया। अपनों से क्या पंगा लेना।
गफूर ‘स्नेही’

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