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प्रार्थना की ताकत

उन्हें जब ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था, तो वह मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे। लौटे तब भी प्रार्थना में जुटे थे। प्रार्थना उनकी दिनचर्या में शामिल थी। यह उन्हें सुख-दुख में संतुलित रखती। वह कहते, ईश्वर से उनकी बातें होती हैं। दरअसल ईश्वर से बातें तो हम भी करते हैं, लेकिन एकतरफा। उनकी बात अलग है। उनकी मानें, तो ईश्वर उनके मित्र हैं और प्रार्थना उनसे सहयोग की अपेक्षा। तर्क के इस दौर में यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रार्थना क्यों? विचारक फ्रांसिस डिनीज कहते हैं, कुछ भी नया करने या कठिनतम दौर से गुजरने का साहस और विश्वास इसी की देन है।

चिकित्साशास्त्री डॉक्टर लैरी डॉसी ने प्रार्थना के चिकित्सकीय पहलू पर किताब लिखी- ‘हीलिंग वर्डस, द पावर ऑफ प्रेयर ऐंड द प्रैक्टिस ऑफ मेडिसिन।’ इसमें उन्होंने 130 ऐसे अध्ययनों के बारे में बताया, जिसमें कहा गया कि यदि आप प्रार्थना को नियंत्रित परिस्थितियों में प्रयोगशाला तक लेकर जाते हैं, तो वह कुछ अद्भुत परिणाम देती है। थोड़े दार्शनिक अंदाज में डॉसी बताते हैं कि प्रार्थना से यह अहसास होता है कि कुछ है, जो अनंत, अमर और सर्वत्र है। वह कहते हैं, ‘यह अहसास इस बात को छोटा कर देता है कि किसी का शारीरिक कष्ट कम हुआ या नहीं। ईश्वर करे ऐसा हो, लेकिन यदि ऐसा नहीं भी होता, तो व्यक्ति उसे स्वीकारने की ताकत अर्जित कर लेता है।’

शराब की लत छुड़ाने वाली वैश्विक संस्था अल्कोहॉलिक्स एनॉनिमस के 12 सूत्री कार्यक्रम में अस्वीकारने की प्रार्थना मूल में है। हालांकि प्रार्थना की भी सीमा होती है। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए की गई प्रार्थना गलत नहीं, लेकिन यह आत्म की अपरिपक्वता दर्शाती है। मदर टेरेसा कहती थीं, यदि तुम प्रार्थना करना चाहते हो, तो और अधिक प्रार्थना करो। अपनी प्रार्थना को और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए उन्होंने सलाह दी थी कि प्रार्थना के शब्द प्रेम भरे हृदय से निकले होने चाहिए।
नीरज कुमार तिवारी

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