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कानून की रफ्तार

अगर बिहार के कुख्यात चारा घोटाले का वृत्तांत लिखा जाए, तो वह आजाद भारत में भ्रष्टाचार का प्रतिनिधि उदाहरण बन सकता है। इस घोटाले में गुरुवार को सीबीआई की अदालत में एक आरोप पत्र दाखिल किया गया, जिसमें लालू प्रसाद यादव और एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र आरोपी हैं। यह आरोप पत्र 1994 से 1996 के बीच 46 लाख रुपये के घोटाले को लेकर है। एक मौजूदा सांसद और एक पूर्व सांसद भी आरोपी हैं। यह आरोप पत्र बताता है कि ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार की जांच की गति कितनी धीमी हो सकती है।

अगर आरोप पत्र दाखिल होने में ही लगभग 17-18 बरस लग गए, तो मुकदमा चलने और फैसला आने में कितना वक्त लगेगा? इसके बाद मामला ऊंची अदालतों में जाएगा और अंतिम रूप से फैसला आते-आते युगों बीत सकते हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में इसीलिए आरोपियों को सजा से डर नहीं लगता, क्योंकि वे जानते हैं कि अंतिम फैसला आते-आते उनकी उम्र तो बीत ही जाएगी। यह बात और है कि चारा घोटाले के मामले में लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र एक से ज्यादा बार जेल जा चुके हैं और लालू प्रसाद यादव को इसके चलते बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था, और अगर ये लोग निर्दोष हैं, तो इतने वर्ष तक बेमतलब इस आरोप को ढो रहे हैं। सजा का डर न होने की वजह से ही यह घोटाला दशकों तक चलता रहा।

पशुपालन विभाग में पैसे की गड़बड़ी की पहली आशंका सीएजी ने सन 1985 में व्यक्त की थी। शुरू में यह घोटाला ज्यादा बड़ा नहीं था और इसमें ज्यादा बड़े लोग शामिल नहीं थे। अगर शुरू में ही इस पर रोक लग जाती, तो इसका इतना विस्तार नहीं होता। लगातार इस घोटाले को लेकर चेतावनियां आती रहीं, लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया। बिहार में एक के बाद दूसरे मुख्यमंत्री आते रहे और घोटाला बड़ा होता गया।

यह माना गया कि 1995-96 तक इस घोटाले में लगभग दस अरब रुपयों की हेराफेरी हो चुकी थी। उसके बाद भी इसकी जांच को रोकने की पूरी-पूरी कोशिश की गई, लेकिन पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की दखल से यह मामला सीबीआई को सौंपा गया और रुक-रुककर ही सही, इसकी जांच होती रही, जो काफी हद तक राजनीतिक परिवर्तनों से जुड़ी रही। इस समूचे प्रकरण के जरिये हम जान सकते हैं कि आजाद भारत में भ्रष्टाचार को रोकने में क्या-क्या रुकावटें आती हैं।

जगन्नाथ मिश्र अब राजनीति से बाहर हो चुके हैं और बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव युग भी बीत चुका है। न बिहार में, न केंद्र में लालू यादव का बहुत महत्व अभी है और इस बात की भी कोई संभावना नहीं दिखती कि भविष्य में उनका राजनीतिक कद उतना ऊंचा हो पाएगा, जितना वह पहले था। इसकी वजह यह है कि लालू प्रसाद यादव की राजनीति लगातार अप्रासंगिक होती गई और वह नए जमाने की आहट को नहीं पहचान पाए।

लेकिन सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार अब भी है और उसे प्रोत्साहित करने वाले तत्व अब भी वैसे ही हैं, यह 2-जी और राष्ट्रमंडल खेल घोटालों से जाहिर है। एक जबर्दस्त भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आया और चला गया लेकिन भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच तेजी से हो सके, इसके लिए उपाय करने में हमारा राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व अब भी सफलता से अड़ंगे लगा रहा है।

बिहार की छवि अलबत्ता बदली है और अब वह अराजकता, भ्रष्टाचार और मनमानी के उदाहरण की तरह पेश नहीं किया जाता। शायद लालू प्रसाद यादव के खिलाफ मामले के निपटारे में अब तेजी आए, क्योंकि उनका राजनीतिक रसूख घटा है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि देश में भ्रष्टाचार को रोकने में प्रभावी कदम उठाए जाएं।

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