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प्रसारण के अस्सी साल

सन 1932 में इसी के जरिये पहला क्रिसमस संदेश घर-घर तक पहुंचा। तब ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम रेडियो के इस आविष्कार से काफी अभिभूत हुए थे। उनके संदेश में इसकी झलकियां मिलती हैं। उन्होंने कहा, ‘अपने घर से और अपने दिल से... पुरुष व महिलाएं, जो बर्फ, रेगिस्तान और समुद्र की वजह से हमसे कटे थे, उन तक यही आवाज है, जो हवा के जरिये पहुंच सकती है।’

दरअसल, वह बीबीसी एम्पायर सर्विस के बारे में बोल रहे थे, जिसकी आज हम 80वीं सालगिरह मना रहे हैं। इन बीते वर्षों में वर्ल्ड सर्विस (अब यह नाम है) न केवल राजनीतिक बाधाओं, बल्कि भौगोलिक बाधाओं को भी पार कर गई। इसकी समाचार सेवा तानाशाहों के मनसूबों की हवा निकाल देती है। इसी ने हैवेल के नाटकों के प्रसारण का दुस्साहस किया था। तब जाकर दुनिया साम्यवादी चकोस्लोवाकिया के सच को जान सकी। बीजिंग के थेन आन मन चौराहे पर हुई बर्बर घटनाओं का पर्दाफाश भी इसी ने किया था।

वैसे लोग, जो बेवजह कैद में हैं, उनके लिए इस सेवा ने लाइफलाइन का भी काम किया है। म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक आंग सान सू की अपनी नजरबंदी के दौरान डेव ली ट्रेविस के म्यूजिक शो को सुनती थीं। फिर भी अक्सर यह दिखा है कि ब्रिटेन वर्ल्ड सर्विस के काम को महत्व नहीं देता है। कई दौर में बजट कटौतियों को अंजाम दिया गया है। बीबीसी के लिए फ्यूचर फंडिंग काफी कम हो गई है। जाहिर है, इससे उसके कर्मचारियों के उत्साह कुछ कम हुए हैं। इस लिहाज से देख जाए, तो इस सालगिरह का आयोजन भी फीका ही रहा। तमाम आपत्तियों के बावजूद बीबीसी की शॉर्ट-वेव ट्रांसमिशन सेवाओं में कमी की गई है।

हमारा मानना है कि यह अदूरदर्शिता है, जो निस्संदेह चिंता का विषय है। ऐसे वक्त में, जब दुनिया भर के देश मीडिया बाजार बनने की छीना-झपटी में जुटे हैं, हमारे पास पहले से ही इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण मौजूद है। हमें यकीन है कि यह सालगिरह और बुश हाउस से ब्रॉडकास्टिंग हाउस में प्रवेश को एक नई ऊंचाई मिलेगी। यही नहीं, इसके संसाधनों में कोई कमी नहीं की जाएगी और वर्ल्ड सर्विस के इस उत्कृष्ट काम को जारी रखा जाएगा।
द टेलीग्राफ, ब्रिटेन

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