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कलम पर हमला

आए दिन अखबारों में पढ़ने को मिल रहा है कि सूचना प्रहरियों और पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। भोपाल में पिछले साल 38 साल की एक सूचना प्रहरी शेहला मसूद की हत्या कर दी गई। उनकी खता बस इतनी थी कि वह सूचना के अधिकार के जरिये घोटालों पर से परदा उठा रही थी। जनवरी 2010 से लेकर अब तक देश के अंदर करीब 12 सूचना प्रहरियों की हत्या हो चुकी है। इस काम से जुड़े 40 लोगों को जान से मारने की धमकी दी जा चुकी है। यही हाल पत्रकार भाइयों का है। इतने ही वक्त में कम से कम आधे दजर्न पत्रकार मारे जा चुके हैं। यही नहीं, जब भी नेता व अभिनेता चाहते हैं, उन्हें लाइव कवरेज के दौरान धमका देते हैं। क्या यह अभिव्यक्ति पर हमला नहीं है? क्या यह सब  कलम की धार को कुंद करने की साजिश नहीं? एक तरह से बेबाक पत्रकारिता के दौर को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। कलम को गुलाम बनाने की इस साजिश को रोकना होगा। आखिर, हमें एक बेहतर समाज और देश बनना है। हमारे सूचना प्रहरी और पत्रकार इसी के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन उन पर हमले करने वालों के खिलाफ सरकारें सख्त कदम नहीं उठा रही हैं। अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आहत हुआ, तो पूरी व्यवस्था को ही ठेस पहुंचेगी।
श्याम सुंदर, तिमारपुर, दिल्ली

रामलीला मैदान का सच
पिछले दिनों ‘रामदेव और पुलिस’ शीर्षक संपादकीय पढ़ा। यकीनन, माननीय कोर्ट ने पुलिस के कृत्य को अलोकतांत्रिक मानते हुए कड़ी फटकार लगाई है। बाबा रामदेव को भी कोर्ट ने दोषी ठहराया। दरअसल, रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण ने अनशन खत्म करने का लिखित आश्वासन दिया था। फिर भी अनशन को जारी रखा गया, जिसकी कोई तुक बनती नहीं थी। माननीय कोर्ट ने दोनों ही पक्षों के हिंसक तत्वों के विरुद्ध मामले दर्ज करने का निर्देश दिया है। बहरहाल, पुलिस आयुक्त का यह बयान हैरान करने वाला है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को आंसू गैस छोड़ने या लाठी चलाने के आदेश नहीं दिए थे। तो क्या दिल्ली पुलिस के सिपाही इतने निरंकुश हो गए हैं कि वे अपनी मर्जी से लाठियां चलाते हैं? यह भी निर्विवाद है कि सरकारी फरमान के बिना इतनी बड़ी और भयंकर कार्रवाई को अंजाम देना संभव नहीं था।
इंद्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैंप, दिल्ली

जन से दूर तंत्र
पिछले दिनों गोपाल चतुर्वेदी का नश्तर पढ़ा। लेख ‘गिर गई गिरी और बचा हुआ नेता’ की आखिरी पंक्ति ‘जनतंत्र में जन को यही रियायत ही क्या कम है’ नागरिकों के लिए एक बड़ा सवाल है। जनतंत्र में जन द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के हाथों ही जन की दुर्दशा क्यों होती है? देश का मालिक जनता है और वह इतना बेबस क्यों है? ऐसे सवालों के जवाब हमें ढूढ़ने होंगे। वरना जन और तंत्र के बीच दूरियां बढ़ती जाएंगी।
एसएन कुंद्रा, शंकर गार्डेन, विकासपुरी

दिल्ली पुलिस और दावे
अधिकतर मंचों पर यही दिखता है कि दिल्ली पुलिस के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में कम से कम जुर्म होने का दावा पेश कर रहे हैं। जाहिर है, ऐसे पुलिस अधिकारियों की जल्दी तरक्की होती होगी। लेकिन इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता ही होगा। दिल्ली के सभी इलाकों में झपटमारी और लूटपाट की घटनाएं घटती रहती हैं। और दिल्ली पुलिस के इन्हीं दावों के चलते पीड़ित लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं। पीसीआर वाहनों पर लिखा होता है- दिल्ली पुलिस आपके साथ। हालांकि यह अब तक साफ नहीं हो पाया है कि यहां ‘आप’ कौन हैं, जनता या अपराधी।
राजेंद्र भारद्वाज, बवाना, दिल्ली

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