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‘30 फरवरी’ ने बदल दी श्यामू और कलावती की दुनिया

इस कलावती की कहानी राहुल की कलावती से कुछ अलग है। डोमिनगढ़ की यह कलावती सिर्फ इसलिए मजदूरी करने पर मजबूर है क्योंकि उसका पति श्यामू ‘30 फरवरी’ को ‘जन्मा’। वह इसलिए भी अभिशप्त है क्योंकि श्यामू पीएसी में भर्ती हो जाने के बावजूद ‘अपनी’ इसी गलती के लिए निकाल दिया गया।

वैसे ‘30 फरवरी’ को ‘जन्म’ लेने में श्यामू का कोई कसूर भी नहीं है। एक मास्टर साहब ने गलती की और दस्तावेजों पर दर्ज हो गया कि श्यामू की पैदाइश ‘30 फरवरी’ को हुई। परिवार पढ़ा-लिखा नहीं था और श्यामू को उतनी समझ नहीं थी सो गलती किसी की पकड़ में नहीं आई। यही गलती रिकार्ड बन गई और अब यह उसकी जिंदगी के लिए नासूर बन चुकी है। डोमिनगढ़ गांव में ब्याही कलावती को पता भी नहीं था कि मजदूरी उसकी मजबूरी क्यों बनीं। काफी दिन बाद वह जान पाई कि कैलण्डर में ‘30 फरवरी’ की तारीख नहीं होती इसी की सजा उसे मिली है।

कलावती के पति श्यामू की कहानी शुरू होती है वर्ष 1975 से। तब श्यामू भूलनपुर वाराणसी में पीएसी में भर्ती हुआ। अभी सात दिन हुए थे कि उसके दस्तावेज में एक छोटी सी गलती पकड़ ली गई। श्यामू के लिए यह गलती छोटी थी मगर थी बहुत बड़ी। दस्तावेजों की जांच में पाया गया कि हाईस्कूल की मार्कशीट पर श्यामू की जन्मतिथि 30 फरवरी 1957 दर्ज है। श्यामू ने सफाई दी कि स्कूल के मास्टर साहब ने अनुमान से जन्मतिथि दर्ज कर दी थी इसलिए वही चली आ रही है। इसे उसका ‘कुतर्क’ ही माना गया इसलिए कोई उसका साथ नहीं दे सका। सेनानायक ने उसे लौटा दिया। उसकी पृष्ठभूमि भी ऐसी नहीं थी जिससे कि वह मुकदमा लड़ पाता।

श्यामू यहां लौट आया। उसने तुलसीदास इण्टर कॉलेज से हाईस्कूल किया था सो वहां गया। दस्तावेज तलाशे गए। पाया गया कि घुनघुनकोठा के जिस स्कूल से उसने प्राइमरी की पढ़ाई की थी, गलती वहीं से हुई है। स्वींटन जूनियर हाईस्कूल में भी यही गलती दर्ज रही और हाईस्कूल में भी इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। तब श्यामू को पता चला कि जब उसके पिता हंसराज प्राइमरी स्कूल में नाम लिखाने गए थे, तब मास्टर साहब ने जन्म तिथि के बारे में पूछा था। पिता निरक्षर थे, इसका जवाब उन्हें नहीं सूझा। उस वक्त मास्टर ने ही जो तिथि दर्ज कर दी, उसे ही मान लिया।

कलावती से शादी के बाद से ही श्यामू घर पर रहते हैं। कलावती मजदूरी करती है। श्यामू भी एक बैंक में कुछ काम कर लेते हैं। किसी तरह घर चल रहा है। कसक यही है कि अगर कैलेण्डर में ‘30 फरवरी’ होती तो शायद आज श्यामू पीएसी में सिपाही होते या रिटायर होकर परिवार के बीच हंसी-खुशी जीवन गुजार रहे होते। अब इस काश का किसी के पास जवाब कोई जवाब नहीं है। जो हो नहीं सकता उस पर किस बात का काश।

हाईलाइटर

‘मालूम ही नहीं था कि कैलेण्डर में 30 फरवरी की तारीख नहीं होती। घर में कोई पढ़ा-लिखा तो था नहीं जो इस गलती को पकड़ पाता। शिक्षकों ने भी ध्यान नहीं दिया, सो अब भुगत रहा हूं वर्ना नौकरी तो मिल ही गई थी। कैलेन्डर में यह तारीख होती तो आज मैं भी पीएसी में सिपाही होता।’
श्यामू, डोमिनगढ़

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  • Web Title:‘30 फरवरी’ ने बदल दी श्यामू और कलावती की दुनिया