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हिन्दी में तुलसी के बाद प्रेमचंद सबसे लोकप्रिय लेखक

वाराणसी, कार्यालय संवाददाता।

हिन्दी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास के बाद मुंशी प्रेमचंद सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक रहे हैं। तुलसी ईश्वर के सहारे लोक तक जाते हैं, वहीं प्रेमचंद ईश्वर के बगैर लोक तक अपनी पहुंच बनाते हैं। यह बात गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. चितरंजन मिश्र ने बीएचयू के कला भवन में मुंशी प्रेमचंद स्मारक शोध एवं अध्ययन केंद्र तथा बीएचयू के हिन्दी विभाग की ओर से आयोजित ‘प्रेमचंद की विरासत’ विषयक संगोष्ठी के दूसरे दिन बुधवार को कही।

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद अपने सभी पात्रों की आर्थिक स्थिति का चित्रण करते हुए उसके आचरण व्यवहार में आर्थिक पक्षों की भूमिका को सावधानीपूर्वक रेखांकित करते हैं। मुख्य वक्ता लखनऊ विवि के प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा कि प्रेमचंद के समग्र साहित्य को एकल दृष्टि से पूर्वाग्रहविहीन ढंग से देखने की जरूरत है।

सवा तीन सौ कहानियां लिखने वाले रचनाकार का मूल्यांकन तीन-चार रचनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके कथास्रेत संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी तथा लोककथाओं की जागृत परंपराओं में निहित हैं। प्रेमचंद की दृष्टि में गांव और शहर का कोई विशेष विभाजन नहीं है। वे अपने सभी पात्रों के श्वेत-श्याम पक्षों का ईमानदारी से रेखांकन करते हुए चलते हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए मुंबई विवि के प्रो. रतन कुमार पांडेय ने कहा कि प्रेमचंद अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में आज जितना पढ़े जाते हैं, उतना हिन्दी भाषी क्षेत्रों में नहीं। उनकी विरासत का अगली पीढ़ी में किस प्रकार संक्रमण हो गया, यह विचारणीय है। संगोष्ठी में डॉ. सतीश राय, प्रो. बीडी मिश्र, डॉ. राम सुधार सिंह प्रो. श्रीनिवास पांडेय, प्रो. अशोक सिंह, प्रो. निर्मल कुमारी वाष्र्णेय, प्रो. नूरजहां बेगम, प्रो. विद्योत्तमा मिश्र, प्रो. महेंद्रनाथ राय ने भी विचार व्यक्त किये। अंत में प्रो. बलिराज पांडेय ने आभार व्यक्त किया। संचालन प्रो. रंगनाथ पाठक ने किया।

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