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टूट गया 'बापू' का सपना

टूट गया 'बापू' का सपना

महॉत्मा गांधी ने कुटीर उद्योग के जरिए आर्थिक समृद्घि का जो सपना देखा था, वह अब आखिरी सांसें ले रहा है। इस सपने को पूरा करने का दारोमदार जिन कंधों पर था, उन बुनकरों को दो वक्त की रोटी भी बमुश्किल ही नसीब हो रही है। हाल यह है कि पूरे दिन सूत कातने पर उन्हें मुश्किल से 30 रुपये ही रोजाना मिल पाते है। उन्हें अब सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं है।

देश के अन्य हिस्सों की ही तरह उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के जैतपुर में खादी उत्पत्ति केंद्र की 1920 में स्थापना की गई थी। इस केंद्र का नाम श्री गांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र था। इस केंद्र में महात्मा गांधी के साथ आचार्य जे. बी. कृपलानी भी आए थे।

केंद्र की स्थापना के बाद गांव के लगभग 200 बुनकर परिवारों ने सूत कताई और कपड़ा बनाने को अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाने के साथ गांधी के सपने को साकार करने का सिलसिला शुरु किया। आलम यह था कि हर घर में चरखा आ गया और सभी ने सूत कातने को अपना धर्म मान लिया था।

देश को आजादी मिली। उसके बाद भी जैतपुर के परिवारों की आय का जरिया सूत कताई और कपड़ा बनाना रहा। सरकार ने खादी उत्पत्ति केंद्र को अनुदान दिया। पहले इस उत्पत्ति केंद्र में कच्चा सूत आता था, जिसे पतला कर कपड़ा बनाया जाता था। फिर कपड़ा उत्पत्ति केंद्र के माध्यम से बाजार तक जाता था।

वर्ष 1980 तक सब ठीक चला, क्योंकि सरकारों की मदद मिलती रही। परिणामस्वरुप केंद्र को चलाने के साथ बुनकरों को पर्याप्त मजदूरी मिलती रही, मगर उसके बाद सूत कताई का काम कमजोर पड़ता गया क्योंकि सरकारों ने मदद करने से हाथ खींच लिए। 

वक्त गुजरने के साथ चरखे की रफ्तार कमजोर पड़ने लगी। आज हाल यह है कि बुनकरों के घरों के चरखे बंद पड़े हैं और उन्होंने रोजी-रोटी का जुगाड़ करने के लिए दूसरे धंधे अपना लिए हैं। कई ने तो चरखे कबाड़ तक में बेच दिए हैं। घरों में चरखे चलते नहीं है। कुछ बुनकर केंद्र में आकर जरुर सूत कातते है।

केंद्र तक कताई करने बमुश्किल से 15 से 20 बुनकर ही आते हैं। यह संख्या भी कम होने का खतरा बना हुआ है। वजह सूत कताई पर बहुत कम मजदूरी मिलना है। यहां एक किलो ग्राम सूत कताई पर 60 रुपये मिलते हैं, जबकि एक व्यक्ति 10 घंटे में अधिकतम आधा किलो ग्राम ही सूत कात पाता है।

कभी जैतपुर के लोगों की जीवन की गाड़ी चलाने में मददगार सूत कताई आज समस्या बन गई है और घरों में बंद पड़े चरखे हकीकत की कहानी खुद बयां कर जाते हैं। एक तरफ  महंगाई बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर सूत कताई में बहुत कम मजदूरी मिलती हैं। ऐसे में बुनकर लगातार इस काम से किनारा करते जा रहे हैं।

कभी सूत कताई कर परिवार चलाने वाली श्याम बाई की उम्र 80 वर्ष की हो गई है और आज वह बीमारी की हालत में हैं और उनके घर का चरखा बंद पड़ा है। वह बताती हैं कि बच्चों मजदूरी करने बाहर चले गए हैं, क्योंकि सूत कताई में उतना पैसा मिलता नहीं है, जिससे जीवन चल सके। लिहाजा बच्चों ने बाहर जाकर मजदूरी करना ही बेहतर समझा।

खादी उत्पत्ति केंद्र पर आकर सूत कताई करने वाली राम दुलारी भी मिलने वाली मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं। वह बताती हैं कि दिन में 14 घंटे भी काम करे तो उन्हें 30 रुपये से ज्यादा की मजदूरी नहीं मिल पाती है। वैसे तो वे दिन में 250 ग्राम ही सूत कताई कर पाती है, इस तरह उनकी मजदूरी 15 रुपये ही बनती है।

राम दुलारी आगे कहती हैं कि जब दिन भर सूत कताई करने पर 15 रुपये ही मिल पाएंगे तो कौन और क्यों इस काम को करेगा। यही हाल रहा तो अभी घरों के चरखे बंद हुए हैं। आगे चल कर केंद्र तक भी कोई नहीं आएगा।
 
केंद्र के प्रबंधक राकेश शुक्ला बताते हैं कि पहले सरकारें मदद किया करती थीं। लिहाजा बुनकरों को भी वाजिब दाम मिल जाते थे और केंद्र को चलाने में भी दिक्कत नहीं आती थी, मगर अब ऐसा नहीं है। अनुदान मिल नहीं रहा है, सब्सिडी में भी कटौती कर दी गई है।

केंद्र के उत्पाद लेखधिकारी उदय भान सिंह कहते हैं कि जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून में आठ घंटे काम करने पर 120 रुपये से ज्यादा मिलते हैं तब 60 रुपये किलो की दर से सूत कताई करने कौन आएगा। इस स्थिति में नई पीढ़ी के लोग इस काम को करने तैयार नहीं है। जरुरत इस बात की है कि बुनकरों को मजदूरी अधिक मिले।

यह केंद्र कपास बुनकरों को देता था और बुनकर सूत कातकर केंद्र को देता था। यह कता हुआ सूत विभिन्न कपड़ा निर्माण करने वाले हथकरघा संचालकों को देकर केंद्र बना हुआ कपड़ा खरीदता था। इस तरह बुनकर व हथकरघा संचालकों के बीच केंद्र काम करता था। उसके बाद केंद्र कपड़े को बाजार तक भेजता था। अब घरों के चरखे तो बंद हो गए है, मगर केंद्र में बनने वाला सूत ही कपड़ा बनाने वाले बुनकरों को दिया जाता है। इस सूत की मात्रा बहुत कम है।

जैतपुर के हालात देखकर यही लगता है कि गांधीवादी लोग ही नहीं बचे हैं। नेता गांधी की बात कर अपने स्वार्थ तो पूरे कर लेते हैं, मगर गांधी के टूटते सपने की चिंता किसी को नहीं है। यही कारण है कि गांधी की पहचान चरखा थम रहा है और खादी पिछड़ती जा रही है। बहरहाल, केंद्र सरकार ने बुनकरों की स्थिति सुधारने के लिए पैकेज की घोषणा तो की है लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि यह पैकेज अन्य घोषणाओं की तरह सतह पर कितना उतरती है और गांधी के सपने को जिंदा रखने में कितनी मददगार साबित होती हैं।

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