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क्या उत्तर कोरिया अब बदलेगा

उत्तर कोरिया को लेकर हमारे नजरिये में फिलहाल बदलाव की कम ही संभावना है। जहां एक ओर उत्तर कोरिया के सरकारी टेलीविजन पर नागरिकों और सैनिकों को इस दुख की घड़ी में सिसकते हुए दिखाया जा रहा है, वहीं पश्चिमी टीकाकार इन्हें खारिज करते हुए दुष्प्रचार बता रहे हैं। निश्चित तौर पर इनमें से ज्यादातर दृश्यों में दिखावा है, रस्म अदायगी है। या तो यह कैमरे के लिए किया जा रहा है या फिर यह तानाशाही व्यवस्था के अभिन्न अंग कॉमरेडों व मुखबिरों के ध्यान खींचने का भी एक तरीका हो सकता है।

‘डियर लीडर’ की मौत का मातम का प्रदर्शन महज एक भेड़चाल ही है। लेकिन कुछ लोगों के लिए उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जांग-इल का निधन सचमुच में मातम का विषय है। इन दृश्यों में कुछ सच्चाई भी हो सकती है, आखिर इस सत्ता ने वहां के लोगों के दिलों में किम खानदान के प्रति एक गहन आसक्ति जमा दी है। किम जांग-इल के पिता किम इल-संग उत्तर कोरिया में वंशानुगत साम्यवादी तंत्र के संस्थापक थे।

अगला साल उनका जन्म शती वर्ष है और इसे मनाने के हकदार उनका पोता किम जांग-उन होंगे। 1994 में किम इल-संग इस जहां को अलविदा कह गए। उस वक्त उत्तर कोरिया में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। तब जाने-माने अमेरिकी पत्रकार बारबारा डेमिक ने उत्तर कोरिया से भागे शरणार्थियों से बात की थी। उन लोगों ने किम इल-संग की मौत की खबर पर गहरी संवेदना प्रकट करते हुए कहा था कि उन्होंने ही उत्तर कोरियाई प्रतिरोध, राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता की पताका फहराई थी।

अगर हम इसे बीजिंग के नजरिये से देखें, तो सारी स्थितियां साफ-साफ दिखने लगती हैं। चीनी क्रांति के अगुवा व पूर्व तानाशाह माओ-त्से-तुंग की निरंकुश विरासत किम वंश से कतई कम नहीं है। उनकी मौत के वक्त भी चीन में ऐसे ही हालात दिखे थे। उत्तर कोरियाई लोगों की तरह ही चीन के लोग भी बाहरी दुनिया के प्रति सीमित जानकारी के साथ कट्टर वैचारिक नियंत्रण के तहत रहते हैं।
चीन के लोगों को बताया जाता है कि उनके नेता विदेशी आक्रमण के खिलाफ राष्ट्रीय प्रतिरोध के अवतार हैं। माओ को कभी भी सत्ता के संस्थापक पद के सम्मान से नहीं हटाया गया, हालांकि बीजिंग अपनी आंतरिक स्थिरता के लिए संघर्ष कर रहा था। बहरहाल, उत्तर कोरिया के इस नेता के निधन के बाद अब सवाल यही है कि क्या वह अपने पड़ोसी की तरह सुधार के रास्ते पर जाएगा?

माओ के दौर में देंग जियाओ पिंग अपने वक्त का इंतजार करते रहे। जब उन्हें सत्ता में आने का मौका मिला, तब वह अपनी सैन्य व कूटनीतिक समझ की बदौलत माओ से भी श्रेष्ठ साबित हुए। चीन को वह बाजार व्यवस्था की ओर ले गए। उसी तरह की उम्मीदें अब किम जांग-इल के 28 वर्षीय बेटे किम जांग-उन से हैं। पिछले साल ही सिंतबर महीने में उन्हें ‘फोर स्टार जनरल’ का दर्जा दिया गया था। निस्संदेह, अब उनके सीने पर ज्यादा तमगे लग जाएंगे। किम जांग-इल राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं थे, इसीलिए उन्होंने अपने तीसरे बेटे को अपना उत्तराधिकारी चुना था। हालांकि किम जांग-उन अपने पिता के विपरीत गैर फौजी व अराजनीतिक वजूद वाले हैं। उत्तर कोरिया में सुधारवादी कार्यक्रमों को चलाने में उनकी दिलचस्पी है या नहीं, फिलहाल इसकी थाह पाना नामुमकिन है। अभी तो उन्हें सेना और पार्टी पर ही निर्भर रहना होगा, कोई भी बदलाव यहीं से शुरू होगा।

उत्तर कोरिया में सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया 2008 में ही शुरू हो गई थी। तब किम जांग-इल को दिल का दौरा पड़ा था। उस वक्त बीजिंग इस मामले में बड़ी दिलचस्पी ले रहा था। चीन ने उत्तर कोरिया के साथ आर्थिक व कारोबारी संबंधों को इसलिए भी मजबूती दी, ताकि उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपने के मामले में किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो। अब बीजिंग को उम्मीद है कि इससे उसके तीन पूवरेत्तर सीमावर्ती प्रांतों में कोई गड़बड़ी नहीं होगी। वैसे चीन की सेना किसी भी अंदेशे की स्थिति में उत्तर कोरिया में हस्तक्षेप के लिए तैयार बैठी है।

लेकिन लगता है कि उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। वैसे भी चीन प्योंगयांग (उत्तर कोरिया की राजधानी) में निवेश, खाद्य व ऊर्जा आपूर्ति का गारंटर है। लेकिन वह किसी भी सूरत में शरणार्थियों को पनाह देने के मूड में नहीं है, उत्तर कोरिया से इसकी 900 मील की सीमा लगती है। बीजिंग यह भी नहीं चाहता कि इस माहौल में दक्षिण कोरिया अमेरिकी मदद से उत्तर कोरिया में किसी प्रकार के विध्वंस को बढ़ावा दे। चीन के मीडिया में यह सवाल रह-रहकर उठ रहा है कि उत्तर कोरिया के साथ बेहतर संबंध से चीन को क्या मिला है? हालांकि अब इस मामले में चीन के पास बहुत कम विकल्प हैं। अब उसे उत्तर कोरिया को काफी धन देने ही होंगे। तभी तो माओ की मौत के बाद चीन में देंग जियाओ पिंग द्वारा किए गए सुधारों की पुनरावृत्ति उत्तरी कोरिया में मुमकिन हो पाएगी।

नेतृत्व में बदलाव से सत्ता को नई कहानी गढ़ने के अवसर मिलते हैं। चीन ने भी महसूस किया है कि आर्थिक सुधारों से सत्तावादी ताकतों को घबराने को कोई जरूरत नहीं होती। वैसे अब तक प्योंगयांग ने चीनी मॉडल के प्रति सीमित दिलचस्पी ही दिखाई है। सख्त सुधारों के बिना उत्तर कोरिया और उसके पड़ोसी देशों के बीच की आर्थिक खाई और चौड़ी हो जाएगी, जिससे उत्तर कोरिया दुनिया के बाकी हिस्सों से कट सकता है। वैसे भी उत्तर कोरिया की चीन पर निर्भरता अत्यधिक है। उत्तर कोरिया में विदेशी निवेश में चीन की 90 फीसदी भागीदारी है। वहां के कुल कारोबार में चीन का 80 फीसदी हिस्सा है। चीन उस मुल्क में विद्युत संयंत्रों, सड़क, परिवहन संरचनाओं को बना रहा है। वहां के आर्थिक विकास में  चीन के उद्यमियों ने पैसे लगा रखे हैं।

इसलिए चीन और प्योंगयांग, दोनों देशों के लिए यह निर्भरता मिले-जुले आशीर्वाद की तरह है। हो सकता है कि दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका की तिकड़ी उत्तर कोरिया को इस विपत्ति की घड़ी में धमकाए, लेकिन उत्तर कोरिया भी अपने मजबूत व वृहत पड़ोसी के बूते आर्थिक उपनिवेश बनने की राह पर है। उत्तर कोरिया का मुख्य अंतरराष्ट्रीय हथियार है ब्लैक-मेल करना। अमेरिका की तरफ परमाणु शक्ति का परचम लहराना और अपनी अस्थिरता से चीन को सशंकित करना। यह नुस्खा एक स्तर तक फायदेमंद है। लेकिन इससे शुरुआती सुधारों की उम्मीद बेमानी ही है।
साभार: द गाजिर्यन
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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