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माई डियर ताज, ...आप झुकना नहीं

दिसंबर के सर्द कुहासे में मौलाना वालमार्ट मुद्दे पर सरकार की तरह झुके चले आ रहे थे। बोले, ‘भाई मियां, कल से ही कमर में बहुत दर्द है। मालिश, सिंकाई, पेन बाम हर तरह के इलाज करा डाले, लेकिन कोई फायदा नहीं। यह मुआ दर्द है कि विपक्ष की तरह डटा है। शायर भी कह गया है- कमर खमीदा (झुकी हुई) नहीं बेसबब जईफी में, जमीन ढूंढ़ रहा हूं मजार के काबिल। हड्डी डॉक्टर भल्ला तुम्हारे दोस्त हैं। जरा चेकअप तो करवा दो। पता नहीं, कौन-सी हड्डी कहां कुछ गड़बड़ कर रही है। यों झुके-झुके देखकर तो लोग समझोंगे कि मौलाना अब जाने को हैं। बेगम अलग परेशान हैं कि अच्छा-भला बुड्ढा टेढ़ा कैसे हो गया।’

कमर सीधी करते हुए दर्द से कराहकर बोले, ‘मियां, सुबह-सुबह एक न्यूज पर नजर पड़ गई। छपा था कि ताजमहल के झुकने और उसकी बुनियाद कमजोर होने की खबरें बेबुनियाद हैं। भाई मियां, ताज तो सन 1653 में बना था। तब की बात अलग थी, आज की अलग है। आज झुकने और बुनियाद कमजोर होने का जमाना है। अच्छे-अच्छों की बुनियाद खुद चुकी है। झुकने का क्रम जारी है।


एफडीआई के आगे सरकार, महंगाई के आगे आम आदमी, सीबीआई के आगे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी के आगे नौजवान, पुलिस के आगे निर्दोष, फिल्मी नंगई के आगे सेंसर बोर्ड.. सब झुक ही तो रहे हैं इस मुल्क में। ऐसे में, मेरी कमर की तरह तुम मत झुकना ताज। तुम्हारा झुकना शहंशाही मोहब्बत की तौहीन होगी। शाहजहां कब्र से निकलकर कहां कोई ईमानदार ठेकेदार ढूंढ़ता फिरेगा, जो तुम्हें पुन: सीधा कर सके।’

मुंह में मुलेठी का एक टुकड़ा डालकर मौलाना बोले, ‘अमां आपने बरसों पहले एक नाटक लिखा था- ‘ठेके का ताजमहल।’ इसमें बेईमान ठेकेदार का रोल आपने खुद किया था। मियां, ताजमहल आज के इंजीनियरों-ठेकेदारों ने बनाया होता, तो झुकने की बजाय मिट्टी का ढेर हो गया होता। खुदा का शुक्र है कि ताज झुकने की ये सारी खबरें बेबुनियाद हैं। मेरा तो दिल इसे सुनकर ही हौका खा गया था। चलो, एक-एक चाय ठोंककर हड्डी डॉक्टर भल्ला के यहां चलें। आह... मेरी यह कमर!’
के. पी. सक्सेना

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