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धन की ऊर्जा

उनके सपनों में पैसों का पेड़ आता है। कल-कल बहती कमाई की नदी दिखती है। उन्हें पैसे कमाने के खेल के सारे नियम पता हैं, इसलिए वास्तविक जीवन में भी उनके पास पैसों की कमी नहीं है। वे ऐसी झील की तरह हैं, जहां चारों ओर से धन की नदियां बहती आती हैं। लेकिन जिस झील से नदी निकलती नहीं, वहां का पानी खारा होता है।

पैसे कमाना, पैसों का सही मोल जानने की तुलना में बहुत आसान है। यह ‘सब कुछ’ और ‘कुछ भी नहीं’ दोनों है। पैसा पाकर भी अमीर होने के भाव से मुक्त रहना एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे ज्यादातर लोग हासिल नहीं कर पाते। मनोवैज्ञानिक मारिया नेमथ के अनुसार, पैसा भी एक प्रकार की ऊर्जा है। इस एनर्जी ऑफ मनी से बहुत कुछ पाया तो जा सकता है, लेकिन तब, जब हमें इसका उपयोग सफलतापूर्वक करना आता हो। अब यह सफलतापूर्वक उपयोग कहा किसे जाए?

मारिया के अनुसार, पैसे का उपयोग उसी तरह से हो, जैसे बारिश के पानी और सूरज की रोशनी का होता है। पैसा कमाना अनिवार्य समझा जाए, लेकिन इसे जमा करने की जरूरत न हो। विनोबा भावे इसे दूसरे रूप में कहते थे, ‘पैसे का खेल फुटबॉल की तरह होना चाहिए। फुटबॉल को कोई अपने पास नहीं रखता। वह जिसके पास पहुंचती है, वही उसे आगे फेंक देता है। पैसे को भी इसी तरह फेंकते जाएं, तो समाज के सारे रोग खत्म हो जाएंगे।’ आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी यही पाया है कि पैसा वही नहीं है, जैसा इसे आमतौर पर समझा जाता है। पैसे की ऊर्जा को इकट्ठा करने से महत्वपूर्ण इसे मुक्त करना है।

मनोवैज्ञानिक डेविड जी मायर्स ने वर्षों के अपने अध्ययन में बताया कि आखिर पैसे और सुख का अंर्तसबंध क्या है। उन्होंने यही पाया, ‘पिछले 50 साल में हमने पैसे के बल पर साधनों की प्रचुरता तो हासिल कर ली, लेकिन हम उतने खुश नहीं हो पाए, जितने हमारे परदादा थे।’   
प्रवीण कुमार

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