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पतुरिया-सी होती हैं किताबें

मैंने मन बना लिया है कि अपने जीवन की सबसे अमूल्य और प्रिय पूंजी, यानी अपनी किताबों को अपने घर से विदा कर दूं। वे जहां भी जाएं, नए पाठकों के बीच प्यार का, ज्ञान का और अनुभव का खजाना उसी तरह से खुले हाथों बांटती चलें, जिस तरह से वे मुङो और मेरे बच्चों को बरसों से समृद्ध करती रही हैं। उन किताबों ने मेरे घर पर अपना काम पूरा कर लिया है, बेशक यह कचोट रहेगी कि दोबारा मन होने पर उन्हें नहीं पढ़ पाऊंगा, लेकिन यह तसल्ली भी है कि उनकी जगह पर नई किताबों का भी नंबर आ पाएगा, जो पढ़े जाने की कब से राह तक रही हैं।

लाखों रुपये की कीमत देकर कहां-कहां से जुटाई, लाई, मंगाई और एकाध बार चुराई गई मेरी लगभग 4,000 किताबों में से हरेक के साथ अलग कहानी जुड़ी हुई है। अब सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन जाएंगी। कहानी, उपन्यास, जीवनियां, आत्मकथाएं, बच्चों की किताबें, अमूल्य शब्द कोश, एनसाइक्लोपीडिया, भेंट में मिली किताबें, यूं ही आ गई कई किताबें, रेफरेंस बुक्स सब कुछ तो हैं इनमें। ये किताबें पुस्तकालयों, वाचनालयों, जरूरतमंद विद्यार्थियों, घनघोर पाठकों और पुस्तक प्रेमियों तक पहुंचें, ऐसी मेरी कामना है।

मेरे प्रिय कथाकार रवींद्र कालिया ने एक बार कहा था कि अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती हैं, जो अपने घर का रास्ता भूल जाती हैं और एक पाठक से दूसरे पाठक के घर भटकती-फिरती हैं और खराब किताबें आपके घर के कोने में सजी-संवरी अपने पहले पाठक के इंतजार में ही दम तोड़ देती हैं।
कथाकार में सूरज प्रकाश

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