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जिद छोड़ने का समय

कई दिनों से व्याप्त राजनीतिक आशंकाओं के बाद एक अच्छी खबर आई है। लोकपाल विधेयक पर ठीक से चर्चा हो सके और इसे पारित किया जा सके, इसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र को तीन दिन के लिए बढ़ाया जा रहा है। अब देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों को एक और मौका मिला है कि वे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के उन प्रावधानों को अमली जामा पहनाएं, जिसके लिए चल रहा आंदोलन इस समय पूरे देश को मथ रहा है।

देश की संसद अगर इसे पास करने के लिए तीन दिन की अतिरिक्त मेहनत करने के लिए तैयार होती है, तो इसका अर्थ है कि यह कई तरह के पूर्वाग्रहों को छोड़ने का वक्त है। खासतौर पर उन पूर्वाग्रहों को छोड़ने का, जो देश की स्थापित राजनीतिक व्यवस्था पर अविश्वास पैदा करने की ओर जा रहे थे। कुछ लोग किसी पार्टी विशेष की नीयत पर सवाल उठा रहे थे और कुछ लोग सरकार की। कुछ मत ऐसे भी उभरने लगे थे, जो पूरी राजनीतिक बिरादरी पर ही सवाल उठाने लगे थे।

दरअसल, हमें यह समझना होगा कि लोकपाल कानून अगर पास होता है और देश में अगर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने वाला एक मजबूत तंत्र बनता है, तो यह बहुत बड़ा बदलाव होगा। इतने बड़े प्रयास को उसकी आखिरी परिणति तक पहुंचाने के लिए देश को एक बहुत बड़े मंथन से गुजरना होगा। इसमें तरह-तरह के विचार आएंगे, सहमतियां और असहमतियां भी आएंगी।

ये विचार, सहमतियां और असहमतियां हमारे लोकतंत्र की ताकत हैं। इनमें जितनी विभिन्नता होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। इनमें जितनी टकराहट होगी, अंतिम नतीजा उतना ही बेहतर निकलेगा। इसलिए जब हम किसी भी कारण से किसी की नीयत पर अविश्वास करते हैं, तो अक्सर नतीजे को बेहतर बनाने का अवसर खो देते हैं।

आम जनता के बीच और सार्वजनिक मंचों पर लोकपाल के मसले पर काफी विमर्श हो चुका है, इसलिए अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद के भीतर मंथन से जो लोकपाल कानून सामने आएगा, वह सभी कसौटियों पर काफी हद तक खरा उतरेगा। हो सकता है कि किसी को इसमें अब भी कुछ कसर नजर आए, या किसी को इसके कुछ प्रावधान पसंद न आएं, लेकिन लोकतंत्र में सुधार का सिलसिला कहीं रुकता नहीं है। इसके लिए बदलाव की कोशिशें और आंदोलन आगे भी जारी रह सकते हैं।

पहले सरकार ने जो लोकपाल विधेयक तैयार किया था और अब विधेयक के जिस रूप की खबरें आ रही हैं, दोनों में काफी अंतर है, जो यह भी बताता है कि भले ही आंदोलन के दबाव में, लेकिन सरकार ने अपनी बहुत-सी जिदें छोड़ी हैं। अब वह समय है, जब सबको अपनी थोड़ी-थोड़ी जिद छोड़नी चाहिए। सिटीजन चार्टर विधेयक अलग पेश हो, लोकपाल का हिस्सा हो, ऐसे मसलों पर तरह-तरह के विचार हो सकते हैं।

इसी तरह न्यायपालिका को लोकपाल के मातहत लाया जाए या फिर अलग से न्यायिक सुधार आयोग बनाया जाए, इस पर भी कई सहमतियां और असहमतियां हो सकती हैं। लोग चाहते हैं कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए एक मजबूत तंत्र बने। जब यह तंत्र बन रहा हो, तो इसके स्वरूप पर एक हद के बाद जिद सारे प्रयासों पर एक अड़ंगे का काम ही कर सकती है। एक हद के बाद ये मसले हमें सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों के हवाले छोड़ने ही पड़ेंगे। कानून की मांग करने और उसका दबाव बनाने के लिए जिस जोश की जरूरत पड़ती है, उसने अपना काम कर दिखाया है। लेकिन कानून को अमली जामा पहनाने के लिए जिस ठंडे दिमाग से विचार की जरूरत होती ह, फिलहाल उसका समय है।

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