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ई. श्रीधरन की सफलता के पांच मंत्र

ई. श्रीधरन की सफलता के पांच मंत्र

मेट्रो मैन के नाम से मशहूर दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपारेशन (डीएमआरसी) के प्रबंध निदेशक ई़. श्रीधरन ने इस धारणा को बदल कर रख दिया कि भारत में परियोजनाएं सही समय पर पूरी नहीं हो सकतीं। उनके प्रेरणादायी नेतृत्व में दिल्ली मेट्रो का 65 किलोमीटर के विस्तार वाला पहला फेज अपने तय समय से पहले केवल दो साल और नौ माह में पूरा हो गया। यह तो काफी बाद की बात है। आज से करीब चार दशक पहले ही उन्होंने छह महीने के प्रोजेक्ट को सिर्फ डेढ़ महीने में पूरा कर संकेत दे दिया था कि आने वाले समय में वह भारत के गौरव साबित होंगे। काकीनाडा गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले श्रीधरन का जन्म केरल के पलक्कड़ में 12 जून 1932 को हुआ था। दिल्ली मेट्रो के पहले उन्होंने कोंकण रेलवे जैसी कठिन और चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अलावा भारत के पहले मेट्रो प्रोजेक्ट कोलकाता मेट्रो के निर्माण में भी उनकी भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। अपनी अमूल्य सेवाओं के लिए श्रीधरन कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। 1963 में उन्हें ‘रेल मंत्री अवॉर्ड’ दिया गया तो 2003 में ‘टाइम मैगजीन’ ने उन्हें ‘वन ऑफ एशियाज हीरोज’ के खिताब से नवाजा। फ्रांस सरकार ने उन्हें 2005 में ‘नाइट ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया, वहीं भारत सरकार ने उन्हें 2001 में ‘पद्मश्री’ तथा 2008 में दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ प्रदान किया। श्रीधरन ने सरकार से कई बार रिटायरमेंट देने के लिए आग्रह किया, लेकिन सरकार उन जैसे ‘जीनियस’ की सेवाओं से महरूम नहीं होना चाहती थी, लिहाजा उनकी रिटायरमेंट टलती रही। लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए सरकार ने उनके रिटायरमेंट को स्वीकृति दे दी है और वह 31 दिसंबर 2011 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। आइए निगाह डालते हैं उनकी सफलता के सूत्रों पर-

समय की पाबंदी
समय की पाबंदी यानी पंक्चुएलिटी का ई़. श्रीधरन से बढ़ कर दूसरा उदाहरण खोजना नामुमकिन नहीं तो नामुमकिन जैसा जरूर है। 1963 में आए एक तूफान ने रामेश्वरम् को तमिलनाडु के मुख्य भू-भाग से जोड़ने वाले ‘पंबन ब्रिज’ को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। रेलवे ने उसकी मरम्मत के लिए छह महीने का लक्ष्य रखा, जिसे श्रीधरन के तत्कालीन बॉस (जिनके अधिकार क्षेत्र के अंदर यह ब्रिज आता था) ने घटा कर तीन महीने कर दिया और इसका जिम्मा श्रीधरन को सौंपा, जिन्होंने केवल 46 दिन में ही यह काम पूरा कर दिया। उनका मानना है कि किसी भी काम में सफल होने के लिए पंक्चुएलिटी बहुत जरूरी है। यही वजह है कि उनके नेतृत्व में दिल्ली मेट्रो के अब तक के सभी फेज तय समयसीमा और बजट में पूरे किए गए हैं।

ईमानदारी
श्रीधरन की कामयाबी की सबसे बड़ी वजहों में से एक है उनकी ईमानदारी। उनका मानना है कि काम केवल समय पर पूरा होना ही काफी नहीं है, बल्कि वह स्तरीय भी होना चाहिए और इसके लिए ईमानदारी बहुत जरूरी है, तभी पूर्ण रूप से सफलता मिलेगी। वह कहते हैं, ‘हम पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के मामले में कभी समझौता नहीं करते।’

पेशेवर योग्यता
श्रीधरन काम करने वालों की पेशेवर योग्यता को लेकर कोई समझौता नहीं करते, लिहाजा उनके द्वारा हाथ में लिया गया कोई भी प्रोजेक्ट असफल या कम गुणवत्ता वाला साबित नहीं हुआ। जब भी जरूरत पड़ी, उन्होंने कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण दिलाया। उन्होंने दिल्ली मेट्रो के निर्माण कार्य में लगे लोगों को बेहतर प्रशिक्षण के लिए विदेश भी भेजा, क्योंकि उनका मानना है कि किसी भी काम की सफलता अंतत: उसे करने वाले लोगों की योग्यता पर ही निर्भर करती है।

स्पष्ट सोच और दृष्टि
कोई भी काम तभी सफल होता है, जब उसे करने वाले के पास एक स्पष्ट सोच और दृष्टि होती है। दुनिया के महान लोगों की सफलता में इस तथ्य को तलाशा जा सकता है। श्रीधरन भी इस बात को पूरी शिद्दत के साथ मानते और अनुसरण करते हैं। वह कहते हैं, ‘लोगों को कष्ट दिए बगैर तय समय और बजट में काम पूरा करने के लिए विजन और स्पष्ट ऑब्जेक्टिव होना बहुत जरूरी है। इसके बगैर सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती।’

सभी घटकों की भागीदारी
श्रीधरन का कहना है, ‘हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि केवल सर्वश्रेष्ठ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ही काफी नहीं है। पारदर्शिता, कार्यक्षमता, जवाबदेही, सर्विस-ओरिएंटेशन और सभी घटकों की सहभागिता भी उतनी ही महवपूर्ण है।’ इस बात को वह सिर्फ कहते ही नहीं, अमल में भी लाते हैं। उन्होंने अब तक के अपने सभी प्रोजेक्टों में उससे जुड़े सभी पक्षों की सहभागिता को सुनिश्चित किया है और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित किया है। यह भी उनकी कामयाबी का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है।

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