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उसी एक की संतान हैं हम सब

क्राइस्ट इतिहास के ऐसे संकट काल में आये थे, जब संसार को आध्यात्मिक आशा और पुनरुत्थान की अत्यधिक आवश्यकता थी। उनका संदेश विभिन्न सम्प्रदायों को बढ़ाने के विचार से नहीं था, जो प्रत्येक उन पर अपना अधिकार जताएं। उनका सार्वभौमिक संदेश एकता का था। उन्होंने मानव जाति को स्मरण कराया कि धर्मशास्त्रों में लिखा है, ‘आप देवता हैं’। और संत यूहन्ना ने क्राइस्ट की शिक्षाओं का प्रचार करते हुए यह भी कहा, ‘‘बल्कि जितने भी लोगों ने उसे (जीसस और समस्त सृष्टि में व्याप्त क्राइस्ट चेतना को) प्राप्त किया, उन सबमें ईश्वर का पुत्र बनने की शक्ति मौजूद है।’’ क्या ऐसा महान संदेश पहले कभी दिया गया था? जीसस ने सभी दलित वर्गों, गोरे व काले व्यक्ति, पूर्व और पश्चिमवासियों को विश्वास दिलाया कि वे सब ईश्वर की संतान हैं; जिसका भी हृदय पवित्र है, चाहे वह किसी भी जाति अथवा रंग का हो, ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

कोयला और हीरा दोनों सूर्य की किरणों को समान रूप से ग्रहण करते हैं, परंतु हीरा उनके प्रकाश को परावर्तित करता है। इसलिए पूर्व और पश्चिमवासियों में  जिनकी मानसिकता हीरे जैसी है वे ईश्वर को प्रतिबिम्बित करेंगे और ईश्वर के पुत्र कहलाएंगे, और जो अवगुणों के द्वारा स्वयं को अंधकारमय रखते हैं वे उनके प्रकाश को परावर्तित नहीं कर सकेंगे।

‘मानवीय भाईचारे को अनुभव करने के लिए अपने हृदय को प्रशिक्षित करें’, समस्त मानव जाति को जीसस के इस महान् संदेश के लिए अपने हृदय को खुला रखना चाहिए। ‘‘ईश्वर ने सभी राष्ट्रों के लोगों को एक ही रक्त का बनाया है।’’ क्राइस्ट की इस प्रेरणा को मैं अत्यधिक प्रेम करता हूं। मैं इस संदेश को व्यावहारिक रूप देकर एक जीवन्त वास्तविकता बनाना चाहता हूं। रंगभेद का पूर्वाग्रह मानव की अज्ञानता के सभी प्रदर्शनों में अधिकतम मूर्खतापूर्ण है। रंग केवल चमड़ी तक गहरा है। ईश्वर ने चमड़ी का गहरा रंग उन जातियों को दिया जो आरम्भ में ऐसे वातावरण में रहते थे जहां तेज धूप से सुरक्षा की उन्हें अधिक आवश्यकता थी, जो कि एक व्यावहारिक उपाय मात्र है; इसलिए सफेद, जैतूनी पीली, लाल अथवा काली चमड़ी पर गर्व करने वाली ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। आखिरकार आत्मा एक जीवन काल में एक रंग का शरीर रूपी वस्त्र पहनती है और दूसरे जन्मों में दूसरे रंगों का। इसलिए व्यक्ति के शरीर का रंग बिल्कुल महत्व रहित बात है। रंग के प्रति कोई पूर्वधारणा रखना उस ईश्वर के विरुद्ध भेदभाव रखना है, जो संसार के समस्त लाल, पीले, जैतून गोरे, काले रंग के लोगों के हृदयों में बैठे हैं। इसके अलावा यह याद रखना भी उचित होगा कि जो कोई भी किसी जाति से घृणा करेगा वह उसी जाति के शरीर में अवश्य जन्म लेगा, इस प्रकार का कर्म विधान मनुष्य को उसके आत्म-दमनकारी पूर्वाग्रहों पर विजय पाने के लिए बाध्य करता है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण है कि अपने हृदय को मानव के प्रति भ्रातृत्व अनुभव करने के लिए प्रशिक्षित करें।

यद्यपि पश्चिम में जीसस की शिक्षाओं की दृढ़ नींव रखना पूर्व निर्धारित था, फिर भी उन्होंने एक पूर्वदेशीय देह में और यहूदी जाति में जन्म लेना चुना, जिसका अत्याचारों का एक लंबा इतिहास रहा है, क्योंकि वे जाति एवं रंग भेद के आधार पर दूसरों की आलोचना करने की मूर्खता को प्रदर्शित करना चाहते थे। सच्चे ईसाई धर्म को जीवन में उतारना चाहिए, जाति के आधार पर विभाजन समाप्त होना चाहिए। पूर्व धारणाएं और सच्चे भ्रातृत्व का अभाव ही ईश्वर की संतानों के बीच युद्ध एवं विभाजन के कारण हैं। हमें युद्ध को भड़काने वाले समस्त कारणों को समाप्त करने के लिए काम करना चाहिए, घृणा और पूर्वाग्रह ही दु:खों का कारण है। जीसस ने चेतावनी दी थी, ‘‘..वो लोग जो तलवार उठाएंगे, तलवार से ही मारे जाएंगे।’’ अन्तत: संसार की स्वतंत्रता के लिए तलवार की नहीं, बल्कि क्राइस्ट के आदर्शों का पालन करने की आवश्यकता है। उच्चतम भाव में, केवल ईश्वर ही आपकी रक्षा करते हैं। क्राइस्ट एवं अन्य सभी आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्धजनों द्वारा सिखाए गए जीवन के आदर्शों का अनुसरण करने से आप इस संसार की सवरेत्तम सहायता कर सकते हैं। सवरेपरि, ईश्वर से प्रेम करें, क्या आप नहीं देखते कि हर वस्तु का समाधान ईश्वर के हाथों में ही है? जब वे रहस्य के पर्दे को हटा देंगे, तो आप उन सब सवालों का उत्तर जान जाएंगे जो अब तक दुबरेध और गूढ़ थे।

पश्चिम के कुछ लोग हिन्दुओं को नास्तिक मानते हैं, वे यह नहीं जानते कि अनेक हिन्दू भी पश्चिमवासियों को नास्तिक मानते हैं-सब जगह अज्ञानता बराबर है। मुङो कई लोग पूछते हैं क्या में जीसस में विश्वास रखता हूं। मैं उत्तर देता हूं , ‘‘ऐसा प्रश्न क्यों पूछते हैं? भारत में हम लोग शायद आप लोगों से ज्यादा जीसस और उनकी शिक्षाओं का आदर करते हैं।’’

क्राइस्ट से प्रेम करने के लिए उनकी शिक्षाओं को जीवन में अपनाना चाहिए, उनके जीवन के उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए। जीसस ने कहा था, ‘‘..यदि कोई दाहिने गाल पर प्रहार करे, जो दूसरा भी उसकी ओर कर दो।’’ भारत ने इन शिक्षाओं का, किसी भी अन्य राष्ट्र की अपेक्षा अधिक अभ्यास किया है। अनेक लोग जो अपने को ईसाई कहते हैं, इस आदर्श का पालन तक नहीं करते, वे यह तो कहते हैं कि यह बहुत सुंदर दर्शन है, पर यदि तुम उन्हें एक थप्पड़ मारोगे तो वे बदले में बारह थप्पड़ मार देंगे, एक ठोकर भी लगा देंगे व शायद एक गोली भी! जो कोई भी इस प्रकार के बदले के भाव रखता है वह सच्चा ईसाई अथवा क्राइस्ट का प्रेमी नहीं है, क्योंकि सभी के प्रति पूर्ण रूप से क्षमाशील जीसस का भाव ऐसा नहीं है।

जब भी आप क्रूस का चिन्ह देखते हैं आपको इसके अभिप्राय को याद करना चाहिए-कि जीसस की तरह उचित अभिवृत्ति के साथ आपको अपने कष्टों को सहना चाहिए। जब आपका भाव ठीक है और फिर भी आपको गलत समझा जाता है अथवा आपके साथ गलत व्यवहार किया जाता है, तो क्रोधित होने की बजाय जीसस की तरह कहना चाहिए, ‘‘हे परमपिता, उन्हें क्षमा कर देना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।’’ उसे क्षमा क्यों करें जो आपके साथ गलत करता है? क्योंकि यदि आप गुस्से में बदला लेते हैं तो आप अपनी दिव्य आत्म-प्रकृति के सच्चे स्वरूप को प्रस्तुत नहीं करते-आप में और अपराधी में कोई अंतर नहीं रह जाता। परन्तु यदि आप आध्यात्मिक शक्ति को व्यक्त करते हैं तो धन्य हो जाते हैं व आपके उचित व्यवहार की शक्ति दूसरे व्यक्ति को अपनी गलतफहमी दूर करने में भी सहायता करेगी।

जीसस के सिखाए सत्य व सदाचार के शाश्वत नियमों को भारत में हम गंभीरता से लेते हैं-हम उनकी अपने लाभ के अनुसार विवेचना दिए बिना, उन्हें अक्षरश: अपनाते हैं। जीसस ने कहा, ‘‘जिसने भी अपने घर या भाइयों, या बहनों, या माता, या पिता, या पत्नी, या बच्चों, और जमीन-जायदाद को मेरे लिए त्यागा है, वह उससे सौ गुना प्राप्त करेगा और अमर जीवन के अपने उत्तराधिकार को प्राप्त करेगा।’’ ईश्वर के लिए त्याग का यह भाव भारत में सर्वत्र-व्याप्त है। प्राचीन काल में प्रत्येक व्यक्ति का यही आदर्श था कि वह अपने जीवन काल का कम-से-कम एक भाग केवल ईश्वर के लिए अर्पित करे।
(‘मानव की निरंतर खोज’ से)

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