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क्या कहते हैं सात चिरंजीवी

एक सहज और स्वाभाविक प्रश्न है, क्या मनुष्य अमर हो सकता है? इसका जवाब इतना आसान नहीं है, क्योंकि आज भी मनुष्य उन सीमाओं के पार नहीं पहुंच सका है, जो उसे अमर बना दें। हां, कभी-कभी कुछ विशेष व्यक्तियों के लिए प्रकृति ने अपने नियम जरूर बदले हैं। ऐसे ही विशेष महामानव हैं- सात चिरंजीवी। ये सात चिरंजीवी इसलिए कहलाए, क्योंकि ये सातों जीवन-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठकर अमर हो गए। इन सात चिरंजीवियों में परशुराम, बलि, विभीषण, हनुमान, महर्षि वेदव्यास, कृपाचार्य और अश्वत्थामा हैं।

इन चिरंजीवियों में से कुछ के बारे में गलत धारणाएं भी प्रचलित हैं, जैसे परशुराम का नाम सुनते ही हमारी आंखों के सामने एक ऐसे ऋषि की तस्वीर उभरती है, जो बेहद क्रोधी स्वभाव के हैं। लेकिन उन्होंने अत्याचारी और अन्यायी राजाओं के खिलाफ ही शस्त्र उठाए। एक आदर्शवादी और न्यायप्रिय राजा के रूप में राम से मिलने के पश्चात वे महेंद्र गिरि पर्वत पर तपस्या करने चले गए। परशुराम भगवान विष्णु के अंशावतार माने जाते हैं। आज्ञाकारी पुत्र के रूप में वे अद्भुत हैं।

इसी प्रकार राजा बलि दैत्यराज होने के बावजूद अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध हैं। विरोचन और सुरुचि के पुत्र बलि की तीन पत्नियां अशना, विंध्यावली और सुदेष्णा थीं। नर्मदा के उत्तरी तट पर मृगुकच्छ नामक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ करने वाले बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोक जीत लिए थे। इतना होने पर भी ऐसे दानवीर कि अपने वचन की रक्षा के लिए उन्होंने गुरु शुक्राचार्य के विरुद्ध जाकर वामन को तीन पग भूमि दान कर दी।

विद्वान विभीषण को ‘घर का भेदी लंका ढाए’ जैसे मुहावरे के रूप में याद किया जाता है। पर विभीषण ने परिवार से बड़ा राष्ट्र होता है, इस आदर्श को सामने रखा। उन्होंने लंका के हित में रावण को बहुत समझाया कि वे माता सीता को राम को लौटा दें। रावण ने उनकी एक नहीं सुनी और अपमानित कर उन्हें लंका से निकाल दिया, पर विभीषण ने राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर रावण का विरोध किया व भाई के द्रोही होने के कलंक को माथे पर ले मातृभूमि के हित में कार्य करते हुए सत्य का साथ दिया।

महर्षि पराशर और धीवर कन्या सत्यवती के पुत्र एक ओर अपना रंग काला होने के कारण कृष्ण कहलाए, तो दूसरी ओर यमुना नदी के बीच एक द्वीप पर जन्म होने के कारण उन्हें द्वैपायन भी कहा जाता है। यही द्वैपायन अपने अथाह ज्ञान के साथ-साथ अट्ठारह पुराण, महाभारत तथा वेदांत सूत्र की रचना के कारण महर्षि वेदव्यास के रूप में सम्मानित हुए। ‘महाभारत’ को पंचम वेद भी कहा जाता है। माता सत्यवती के कहने पर इन्होंने विचित्रवीय्र्य के निधन के पश्चात उनकी पत्नी अंबिका, अंबालिका और दासी से नियोग द्वारा तीन पुत्रों की उत्पत्ति की, जिन्हें धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के रूप में जाना जाता है।

कुरुवंश के कुलगुरु के रूप विख्यात कृपाचार्य ऋषि होने के साथ-साथ अद्वितीय योद्धा भी थे। इन्होंने कौरवों-पाण्डवों को अस्त्र विद्या सिखाई। इनकी बहन कृपी का विवाह गुरु द्रोणाचार्य से हुआ। महाभारत का युद्ध इन्होंने कौरवों की ओर से लड़ा था। कृपाचार्य परिस्थिति के अनुसार अपने को ढालने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए ये कौरवों की ओर से लड़ने के बावजूद उनकी पराजय के पश्चात पांडवों के कुलगुरु के पद पर आसीन हुए।

गुरु द्रोणाचार्य और गौतमी के पुत्र अश्वत्थामा प्रचंड योद्धा होने के साथ-साथ अपने अंहकार के लिए भी जाने जाते हैं। इन्होंने महाभारत का युद्ध कौरवों की ओर से लड़ा। यह घटना युद्ध के अंतिम दिनों की है। अश्वत्थामा ने रात के अंधकार में युद्ध के नियमों को तोड़ते हुए पांडव शिविर में जाकर पांडवों के धोखे में उनके पांच पुत्रों का वध कर दिया। अश्वत्थामा के इस अपराध के लिए कृष्ण ने उनके मस्तक से मणि निकालकर रिसते हुए घाव के साथ भटकते हुए अमर होने का श्राप दे दिया।

रूद्र के ग्यारहवें अवतार हनुमान का जन्म ही भगवान राम की सेवा के लिए हुआ था। सेवक व सेवा का जैसा आदर्श हनुमान ने प्रस्तुत किया है, वह दुर्लभ है। तभी तो भगवान राम ने उनसे कहा था- ‘तुम मम प्रिय भरत सम भाई।’ यह उनके एकनिष्ठ समर्पण का ही फल है कि एक सेवक, जो सबका संकटमोचक है, अपने स्वामी के साथ संसारभर में पूजा जाता है।

 

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