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निंदा करने योग्य कुछ नहीं

प्रकृति का जो रूप, आकार और प्रकार दिखाई दे रहा है, वह परम ब्रह्मा का ही रूप है। हम उसे एक पृथक सत्ता के रूप में देखते हैं और स्वयं के हित-अहित का मूल्यांकन करते हैं तो अवांछित वस्तु की निन्दा करने लगते हैं। हमारी निन्दा व्यक्तिगत मोह पर आधारित होती है। कभी किसी भौतिक वस्तु से घृणा हो जाती है, कारण है कि वह या तो आपके लिये हितकर नहीं है या फिर वह आपके हितों पर प्रहार कर रही है। यहां निंदा करने के लिए वस्तु का महत्व नहीं है अपितु व्यक्ति के निजी स्वार्थ का अधिक महत्व है। यह स्वार्थ ही हमारा मोह है।  इस मोह से मुक्त हो जाते हैं तो प्रत्येक वस्तु प्रिय प्रतीत होने लगती है।

उपनिषदों में अनेक भौतिक वस्तुओं के माध्यम से ब्रह्म उपासना की व्यवस्था है। ऋषि कहते हैं कि सृष्टि बहुत सुन्दर रचना है। इसलिए हमारे शास्त्र हमें श्रेय मार्ग पर चलने का आह्वान करते हैं। प्रेय मार्ग तात्कालिक सुख पर आधारित होता है जबकि श्रेय मार्ग अनन्त आनन्द की ओर ले जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार श्रेष्ठजन सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति सहृदयता और अपनत्व का व्यवहार करते हैं, वैसा व्यवहार हमें भी करना चाहिये। यह स्थिति उस समय उत्पन्न हो जाती है जब आत्मज्ञान और अद्वैत तक एक दूसरे में समाहित हो जाते हैं। इसके लिये शिक्षा की नहीं, ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान आत्मा का विषय है, शिक्षा मस्तिष्क का। शिक्षित होकर ज्ञानतत्व की ओर अग्रसर होंगे तो सृष्टि से द्वैत सम्बंध नहीं होगा। यह भी ज्ञात होगा कि जो वस्तु हमारे लिये अहितकर प्रतीत हो रही है, वह इस सृष्टि के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है।

ऋग्वेद में ऋषि कामना करते हैं कि उनके पास वह बुद्घि हो जिससे वे सृष्टि से अपने अभेद सम्बंधों को जान सकें और उसके प्रति आदर प्रकट कर सकें। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे सर्व व्यापक परमात्मन्! तुम हमें विश्वहितकारी सुमति दो। तुम हमें निर्दोष बुद्घि दो जिससे हमें प्रचुर धन, सम्पत्ति एवं सुख प्राप्त हो तथा सबको प्रेम देते हुए प्रेमपूर्ण रहना सीखें। इस मंत्र में निर्दोष बुद्घि शब्द का प्रयोग किया गया है। दोष क्या है, जो बुद्घि में नहीं होना चाहिये? हमें केवल अपने अस्तित्व की सीमाओं तक केन्द्रित न रहकर व्यापकता में प्रवेश करना चाहिये। यही स्थिति निर्दोष बुद्घि को जन्म देती है।

पंचतंत्र में एक सुंदर कथा आती है जो इस बात को अच्छी तरह से स्पष्ट कर सकती है। एक संन्यासी वन की ओर जा रहे थे। वे चलते-चलते ऐसे वन क्षेत्र में पहुंच गये, जहां केवल कांटेदार पौधे थे। वे जहां भी निकलते उसके वस्त्र कांटों में आ जाते। उन्होंने कहा कि हे ईश्वर! तूने भी यह क्या कष्टकारी पौधे अपनाये हैं। इनका काम क्या है? इतने में ही एक पशुपालक दर्जनों बकरियों को लेकर उधर आ गया। वह कांटेदार पौधों को देखकर प्रसन्न हो गया और कहने लगा कि इतना अच्छा वन है। यहां मेरी बकरियों को पर्याप्त भोजन मिल जायेगा। पशुपालक की बात सुनकर संन्यासी बोले कि भाई! कांटेदार वन को देखकर आप प्रसन्नचित्त क्यों हो? क्या आपकी बकरी कहीं और घास नहीं खा सकती थी? इस पर पशुपालक बोला, ‘‘हे भद्र संन्यासी! आपको ज्ञात होना चाहिये कि कांटेदार पौधे ही बकरियों का सबसे रुचिकर भोजन होता है, बहुत समय पश्चात मेरी बकरी रुचि के साथ अपना भोजन ग्रहण करेंगी।

इस घटना से स्पष्ट है कि कोई भी निंदा के योग्य नहीं है। सबका अपना-अपना महत्व है। हो सकता है कि हमारी मोह दृष्टि उसके महत्व को समझ नहीं पा रही हो।

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