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अपील दर अपील फंसे उपभोक्ता

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (सीपी ऐक्ट) को लागू हुए 25 वर्ष बीत चुके हैं, पर देश भर की उपभोक्ता अदालतों में 37 लाख मुकदमे लंबित हैं। दर्ज मामलों के कुछ नमूने हैं- कर्नाटक के बेल्लारी में उपभोक्ताओं ने वोल्टेज घटने-बढ़ने के मामले में बिजली विभाग पर मुकदमा किया, बिहार में एक किसान ने ट्रैक्टर डीलर को खराब ट्रैक्टर देने का आरोपी ठहराया, दिल्ली के एक निवासी ने मैरिज ब्यूरो के खिलाफ इसलिए मुकदमा किया है कि उसकी बेटी को योग्य वर नहीं मिला, तमिलनाडु में एक दंपती ने विद्यालय परिसर में अपने बचिचें की दुखद मौत के मुआवजे की मांग, और आंध्र प्रदेश में किसानों ने घटिया बीज के लिए बीज निर्माता कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया है।

अलबत्ता, इस विशिष्ट कानून ने अपने न्याय तंत्र के जरिये उपभोक्ता संरक्षण की अवधारणा को इंकलाबी पहचान दी है। इससे पहले उपभोक्ता राज्य एजेंसियों में व्याप्त भ्रष्टाचार व अक्षमता से त्रस्त थे। खुदरा क्षेत्र में कारोबार संबंधी धांधली, स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं में लापरवाही और रेलवे व उड्डयन कंपनियों की निर्मम उपेक्षा ने उन्हें झकझोर रखा था। इससे आम लोगों का मनोबल बढ़ा है।

अदालतों के जरिये वह कारोबारियों, उत्पादकों, दस्तकारों व सेवा प्रदाताओं पर लगाम लगा सकते हैं। इन सबके खिलाफ जांच मुमकिन हो पाई है। यहां तक कि इन संस्थाओं को गलती, लापरवाही व निष्क्रियता पर डांट-फटकार भी लग सकती है। उपभोक्ताओं की शिकायतों की वजह से ही कई फैसले मील के पत्थर साबित हुए हैं।

लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम एम के गुप्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा संचालित भूमि विकास संस्थाओं को उनकी काहिली और अक्षमता के चलते कड़ी निंदा की। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़ित उपभोक्ता मुआवजे के हकदार हैं। वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वीपी शांथा मामले में चिकित्सा जगत के पेशेवरों के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज किया गया कि वे उपभोक्ता कानून के तहत उत्तरदायी नहीं ठहराए जा सकते हैं। इन फैसलों ने उपभोक्ता अधिकारों को देश में मजबूती दी है। लेकिन न्यायिक फैसलों में देरी के चलते पूरी प्रक्रिया कमजोर होने लगी है। इस विघ्न की कई वजहें हैं। अगर हम पूरी प्रक्रिया पर शुरू से नजर डालें, तो पता चलता है कि राज्य सरकारें उपभोक्ता अदालतों को राज्य व जिला स्तर पर गठित करने के लिए तैयार ही नहीं थे।

हालांकि कानून के मुताबिक राज्य स्तर पर उपभोक्ता अदालत और जिला स्तर पर डिस्ट्रिक्ट फोरम अनिवार्य हैं। सुप्रीम कोर्ट से जब राज्य सरकारों को चेतावनी मिली, तब जाकर आयोग और फोरम बने। इसके बाद इन अदालतों में न्यायाधीशों को नियुक्त करने में देरी हुई। जिससे कई राज्यों में लंबे वक्त तक इस तरह की अदालतें बंद ही रहीं। देश भर में 629 डिस्ट्रिक्ट फोरमों में से 11 फोरम तो रिक्तियों की वजह से बंद हैं। नई दिल्ली में भी नेशनल कमिशन की दो संस्थाएं काम नहीं कर रही हैं। वजह वही पुरानी- चार सीटें खाली हैं।

ऊपर से उपभोक्ता शिकायतों में तेजी से इजाफा हो रहा है। इससे भी अनसुलझे मामलों की तादाद बढ़ गई है। फिर अदालती सुनवाई के दौरान जटिल प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है। वकीलों द्वारा बार-बार सुनवाई मुल्तवी करने से भी हालात बदतर हुए हैं। उपभोक्ताओं पर क्या बीत रही है, इसके प्रति सदस्यों की संवेदनहीनता और कम मुआवजे की पीड़ा भी दुखदायी है। इन्हीं कमियों का फायदा खुदरा कारोबारी, उत्पादक और सेवा प्रदाता उठा रहे हैं। उन्हें लगता है कि उपभोक्ता अदालतों के आदेशों का नियमित तौर पर उल्लंघन कर वे पूरी सुनवाई प्रक्रिया को वर्षों तक खींचने में कामयाब रहेंगे और इससे उपभोक्ताओं का मनोबल टूटेगा। बेरोजगार युवा निराकार साहू की याचिका एक बेहतरीन उदाहरण है। उसने एक बैंक के खिलाफ मुकदमा दायर किया, क्योंकि बैंक प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत कर्ज नहीं दे रहा है। वह मुकदमा जीत भी गया, लेकिन बैंक अपनी युक्तियों के जरिये कर्ज देने में देरी करता रहा। मामला राष्ट्रीय आयोग तक पहुंचा। इस दौरान नौ साल बीत गए और वह योजना ही समाप्त हो गई। भाऊ साहेब देवराम पाटिल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस मामले में, उपभोक्ता अदालत ने संबंधित कंपनी को आदेश दिया कि भाऊ साहेब की खराब टीवी को या तो दुरुस्त किया जाए या उनके पैसे लौटाए जाएं। 13 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई चलती रही, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। महाराष्ट्र के 129 में से 10 किसान ऐसे रहे, जो घटिया कपास बीज के बदले मुआवजे की मांग करते रहे, पर पूरी प्रक्रिया इतनी लंबी चली कि वे अपनी जीत को जीते जी नहीं देख पाए।

उपभोक्ता कानून ‘त्वरित और कम खर्चीले’ न्याय का वायदा करता है। इसमें शिकायतों को 90 दिनों के अंदर सुलझाना होता है। लेकिन महज 25 फीसदी मुकदमे ही तय वक्त के अंदर सुलझाए जाते हैं। बाकी पांच महीने से लेकर तीन साल तक लटकते चलते हैं। अगर अपील पहले राज्य व राष्ट्रीय आयोग में दायर किया जाए और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाए, तो मामला और लंबा चल जाता है। अदालती फरमानों को अमल में लाने में भी देरी होती है।
इन अदालतों को त्वरित न्याय की आस में ही गठित किया गया था। इस उद्देश्य को देखते हुए कानूनी शिकायतों के समाधान की समय-सीमा शुरुआत में ही निर्धारित हो जानी चाहिए थी। लेकिन वर्ष 2003 में  कानून में संशोधन के जरिये समय-सीमा को डाला गया। हालांकि तब तक काफी देर हो चुकी थी। 17 साल गुजर गए थे और अदालतों में ऐसे मामलों की भीड़ लग गई थी। अब इन विसंगतियों को सुधारने के लिए उपभोक्ता अदालतों के कामकाज की नियमित व प्रभावी जांच-पड़ताल जरूरी है। कानून में भी कुछ फेरबदल करने होंगे। वकीलों की दखल पर लगाम लगाने से देरी के मामले कम होंगे और प्रक्रिया भी सरल होगी। एक लाख रुपये तक की सामग्री के संदर्भ में की गई शिकायतों में वकील और अपील, दोनों की ही इजाजत नहीं होनी चाहिए। फोरम के समक्ष 25 फीसदी शिकायतें घरेलू और दूसरे सामान को लेकर हैं। इसे अदालत के बाहर भी सुलझाया जा सकता है। बशर्ते सरकार उद्योग व कारोबार तंत्र पर दबाव बनाए कि वे इस तरह के विवादों को निपटाने के लिए वैकल्पिक व प्रभावी तंत्र स्थापित करेंगे।

आज जरूरी है कि बेहतर सेवा व सामान के विनियमन कानूनों को सही तरीके से लागू किया जाए, तभी बोझ कम होगा। लेकिन इन सबके लिए सरकार को अपनी वही प्रतिबद्धता दिखनी होगी, जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस कानून को लाकर किया था। वरना उपभोक्ता कानून की रजत जयंती का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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