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जबान में हड्डी नहीं होती, इसलिए मुड़ जाती है

मैंने कहा, ‘बात क्या है, कुछ उखड़े-उखड़े लगते हो?’
करतारा ने बताया, ‘कुछ देर पहले एक साहब मिल गए। कहने लगे कि फलां नेता के करोड़ों रुपये स्विस बैंक में जमा हैं। मैंने जब यह पूछा कि आपको कैसे मालूम, तो वह बोले कि वह नेता साल में एकाध बार विदेश जरूर जाता है। मैंने कहा कि पर आप तो दो-तीन बार जाते हैं। इस पर वह लड़ने को तैयार हो गए। सरजी, लोग बिना सोचे-समङो ऐसी बातें क्यों करते हैं?’

मैंने कहा, ‘लोकतंत्र में हरेक को बोलने की आजादी है। फिर, जबान में हड्डी तो होती नहीं, जब जिधर चाहो, मोड़ सकते हो। तुम किसी भी नेता को चोर कह सकते हो। वह प्रोटेस्ट करेगा, तो कहो कि मैंने तो कह दिया, अब सिद्ध कीजिए कि आप चोर नहीं हैं। खुद को पाक-साफ साबित करने में उसे बरसों लग जाएंगे। लेकिन चोर के ठप्पे का दाग जिंदगी भर उसकी पीठ पर चिपका रहेगा। यही नहीं, तुम एक मैदान में लोगों को इकट्ठा कर लो और सरकार के एक-एक नेता का नाम लेते हुए, पानी पी-पीकर, उन्हें नाकारा, नालायक और बेईमान कहो, जितना चाहे बुरा-भला कहो। तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हां, इसके साथ ही एक बात जरूर याद रखना, अपने बचाव में यह कहना मत भूलना कि मैं न तो सरकार के खिलाफ हूं और न ही किसी का अपमान कर रहा हूं।’

करतारा ने जानना चाहा, ‘क्या लोग विश्वास कर लेंगे?’ मेरा जवाब था, ‘लोगों के मूड को और माहौल को देखकर जोरदार तरीके से कहोगे, तो लोग तुम्हें सिर-आंखों पर बैठा लेंगे।’ अब उसने पासा मेरी तरफ फेंका, ‘सरजी, क्या आप भी हवाई बातें करते हैं?’
मैंने बताया, ‘हां, कभी-कभी। अभी उस दिन एक महफिल में एक सज्जन यूरोप के एक दार्शनिक के सिद्धांत को बताकर बोर किए जा रहे थे। मैंने उठते हुए कहा, ‘आपने अभी तक जो कुछ भी बताया है, वह सब कोरिया का फिलॉसफर जियॉन्ग चांग ढाई हजार साल पहले कह चुका था।’ करतारा चहका, ‘सरजी, हम भी तो सुनें कि जियॉन्ग चांग ने क्या-क्या कहा है।’ मैंने कहा, ‘मुझे कुछ नहीं मालूम। न ही मैं यह जानता हूं कि इस नाम का कोई आदमी कोरिया में कभी था भी या नहीं।’

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