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दुख से मुक्ति

कष्ट और आनंद, दोनों का इस ग्रह पर अस्तित्व है। इस दुनिया में आने का आपका पहला अनुभव बहुत कष्टदायक था। आप खुशी से अपनी माता के गर्भ में तैर रहे थे, और अचानक सारा तरल पदार्थ चला गया और आपको एक तंग रास्ते से गुजरना पड़ा। यह अत्यंत कठोर था और आपको अत्यंत कठिन समय का सामना करना पड़ा। जैसे ही एक शिशु का जन्म होता है, वह अपना शरीर सिकोड़ लेता है, जैसे उसने बहुत बड़ा काम किया है और फिर रोने लगता है। यह आपकी दर्द की पहली अनुभूति है। कष्ट और आनंद, दोनों होते रहते हैं।
दुख तब होता है, जब आप कष्ट से बचने का प्रयास करते हैं। या जब आपकी धारणा होती है कि यह कष्ट आपको होना ही नहीं चाहिए। दुख का अर्थ है, वर्तमान में अपने अतीत से बंधे रहना। इसलिए दुख भी वर्तमान में है, क्योंकि आपका मन एक बीते हुए क्षण से जुड़ा हुआ है, कभी-कभी यह अनिवार्य हो सकता है, पर ज्ञान के साथ ऐसे समय को कम किया जा सकता है। महर्षि पतंजलि जी ने कहा है- हेयं दुखम अनागतम; जो दुख भविष्य में आ सकता है, उससे बचने के लिए योग है। यदि आप भोजन के प्रति सावधान रहते हैं, और आपकी खाने की आदतें अच्छी हैं, तो आपको कभी मधुमेह, रक्तचाप, दमा, हृदय रोग आदि बीमारियां नहीं होतीं। ये समस्याएं क्यों होती हैं? क्योंकि आप कहीं किसी चीज के प्रति लापरवाही बरतते हैं। यदि अपने संबंधों की तरफ ध्यान नहीं देते, तो आप उनसे जुड़ी समस्याओं में पड़ जाते हैं। कभी-कभी बिना किसी कारण आपको लगता है कि आप दुखी हैं, तो जान लीजिए कि ये आपके अतीत के कुछ दुख हैं, जिनके बारे में आपको कुछ ज्ञात ही नहीं है। यदि आप और गहन ध्यान में जाते हैं, तो यह प्रकट होगा और आप देख पाएंगे कि अतीत के कुछ ऋण हैं, जो अब आप चुका रहे हैं। बस, उन्हें पूरा करें और आगे बढ़ें।
श्री श्री रविशंकर

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