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दिल्ली, जो राजधानी है

नई दिल्ली के सौ साल साल पूरे हो गए, चारों तरफ धमा-चौकड़ी मची हुई है। कोई चचा जौक की पंक्तियां दोहरा रहा है कि कौन जाए जौक पर दिल्ली की गलियां छोड़कर। कोई दिलवालों की दिल्ली को लेकर तुकबंदियां गढ़ रहा है। पर तमाम दिल्ली प्रेमियों से क्षमा याचना सहित मैं कुछ कहना चाहता हूं। मुझे दिल्ली में रहते हुए सात-आठ साल हो गए और मुझे लगता है कि कौन जा पाएगा दिल्ली की गलियां छोड़कर। यहां तो आदमी की हालत राशन की दुकान में रहने वाले चूहे जैसी है। यहां रहे, तो किसी न किसी दिन किसी शिकंजे में फंसकर मारे जाएंगे। छोड़कर चले गए, तो भूख से मरेंगे। मैं जबलपुर-भोपाल से आया हूं। गांव देखे हैं। पत्रकारिता में बाल पूरे तो सफेद नहीं हुए, मगर खिचड़ी हो चले हैं। राजनीति और शासन-प्रशासन के पीछे-पीछे खबर की तलाश में घूमा हूं। भारत के कुछ देहात घूमे हैं। एक बात कह सकता हूं कि दिल्ली का और भारत का कोई खास रिश्ता नहीं है। दिल्ली के इतिहास में शायद ही कोई सदी ऐसी गुजरी होगी, जब इस शहर ने खून की होली नहीं खेली हो। विलियम डालरिम्पल की किताब लास्ट मुगल में जिक्र है कि 1857 के गदर में दिल्ली के मूल बाशिंदों ने किस तरह से गदर करने वालों से अपनी जान छुड़ाई। इसे चाहे दिल्ली की दरियादिली कहिए या बेदिली। मुझे भरोसा है कि इतना सब कहकर भी मैं बच जाऊंगा। कोई मुझे पीटेगा नहीं, कोई मेरे घर या दफ्तर पर हमला नहीं करेगा। इसीलिए इस बड़े शहर में छोटा आदमी होने के कुछ फायदे मैं भी उठा रहा हूं।
बीबीसी में अविनाश दत्त

 

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