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किम जांग का जाना

किसी देश का नेता जब दुनिया को अलविदा कहता है, तो अक्सर गम का माहौल बन जाता है। लेकिन तानाशाहों के मामले में ऐसा नहीं होता। उनके जीवन की तरह ही उनकी मौत भी दहशत और आशंकाओं का माहौल ही पैदा करती है। उत्तर कोरिया के नेता किम जांग इल के निधन के बाद भी दुनिया का हाल कुछ ऐसा ही है। जापान ने तो उनके निधन की खबर सुनने के बाद बाकायदा सुरक्षा बैठक की और पूरे देश से किसी भी हालात के लिए तैयार रहने को कहा गया। अमेरिका और पश्चिमी देश भी हालात पर नजर रखे हुए हैं। उत्तर कोरिया का एकमात्र दोस्त चीन भी चिंतित है, क्योंकि प्योंगयांग की सत्ता का कोई बदलाव उसके उन समीकरणों को बिगाड़ सकता है, जिसके भरोसे चीन ने जापान, वियतनाम जैसे पड़ोसियों के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। पूरी दुनिया किम के बारे में फैलाए गए फसानों को जितना जानती है, उनकी हकीकत को उससे बहुत कम। उनके बारे में जो थोड़े-बहुत सच पता हैं, वे भी कम दिलचस्प नहीं हैं। किम जांग ‘साम्यवादी वंश-परंपरा’ के नेता थे। उनके पिता किम इल संग उत्तर कोरिया की साम्यवादी पार्टी के नेता थे और उन्होंने अपने जीते जी किम जांग को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। 1994 में पिता के निधन के बाद वह आसानी से अपने देश के सर्वोच्च नेता बन गए। तब लगता था कि वह ज्यादा दिन शासन नहीं चला पाएंगे। पश्चिम के विशेषज्ञ दरअसल किम जांग की अनुभवहीनता और परिवार के दूसरे सदस्यों से उन्हें मिलने वाली चुनौती की आशंकाओं के कारण इन नतीजों पर पहुंचे थे। लेकिन तब से उनका एकछत्र शासन उत्तर कोरिया में चल रहा था। पिता ने देश को जिस लोहे की दीवार में कैद किया था, बेटे ने उसे और मजबूत ही बनाया। अब यह माना जा रहा है कि उनके बाद उनका भी बेटा ही सत्ता पर काबिज होगा। किम जांग के बारे में बाकी जो कहा-सुना जाता है, वह फसाना ही लगता है। वह कब और कहां पैदा हुए, इसे लेकर भी कई तरह की तारीखें और बातें हैं। कोरिया के सरकारी मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान में उन्हें ‘सुप्रीम लीडर’, ‘सुप्रीम कमांडर’, ‘डियर लीडर’, ‘अवर फॉदर’ वगैरह कहा जाता है। जबकि दक्षिण कोरिया और पश्चिम का मीडिया उन्हें अय्याशी के शौकीन शराबखोर शख्स और ‘प्लेब्वॉय’ की तरह पेश करता है। इन दोनों ही तरह के चित्रण में अतिशयोक्ति हो सकती है, पर सच यही है कि उत्तर कोरिया की जो व्यवस्था है, उसकी भारी कीमत वहां की जनता को चुकानी पड़ी है। खासकर उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार बना लेने के बाद। इसके बाद से चीन को छोड़कर तकरीबन पूरी दुनिया ने ही उसका आर्थिक बायकॉट किया हुआ है।

परमाणु शक्ति से संपन्न उत्तर कोरिया के बारे में कहा जाता है कि उसकी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा दरिद्रता और भुखमरी की चपेट में है। यह एक ऐसा तथ्य है, जिसे सिर्फ पश्चिम का प्रचार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बाकी दुनिया से उत्तर कोरिया का कारोबार लगभग न के बराबर है। उसकी गिनती औसत दर्जे के औद्योगिक उत्पादन वाले देशों में भी नहीं होती। सभी तरह के आर्थिक सूचकांकों के मामले में वह काफी पिछड़ा हुआ है। उसकी तुलना अगर हम पड़ोस के दक्षिण कोरिया से करें, तो वह दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में आ गया है। दक्षिण कोरिया को एक चमत्कार माना जाता है, जो एक पीढ़ी में ही विकासशील देश से विकसित देश बन गया था। जबकि उसी का दूसरा भाई ‘प्रगतिशील व्यवस्था’ के नाम पर और पीछे चला गया है। ऐसे में किम जांग के जाने के कुछ खास मायने नहीं हैं, मायने तो तभी होंगे, जब उत्तर कोरिया से तानाशाही का खात्मा होगा।

 

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