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अफगानिस्तान की बदनसीबी

सीएनएन के साथ एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति हामिद करजई ने इस हकीकत को कुबूल किया है कि अफगान खुद को महफूज महसूस नहीं कर रहे हैं। तीन दशक से भी अधिक वक्त बीत चुका है, लेकिन बदकिस्मती से आज भी इस मुल्क के लोग जबर्दस्त हिंसा, जंग और आपसी टकराव को झेल रहे हैं। दहशतगर्दी की घटनाओं में मासूम अफगानियों की मौतें लगभग रोजाना ही देश-विदेश के मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। अपने वतन में सुरक्षा के बदतर हालात की वजह से हर साल हजारों की तादाद में मर रहे अफगानियों की जिंदगी अफगानिस्तान के बाहर भी दुश्वारियों से घिरी है। शनिवार को ऑस्ट्रेलिया के क्रिसमस द्वीप की तरफ शरणार्थियों को लेकर जा रही एक नाव डूब गई, जिस पर बड़ी संख्या में अफगानी शरणार्थी भी सवार थे। हालांकि शरणार्थियों की ठीक-ठीक संख्या अभी पता नहीं चली है, लेकिन एबीसी ऑस्ट्रेलिया के मुताबिक, नाव पर 380 लोग सवार थे, जिनमें से 76 को बचा लिया गया है, बाकी अब तक लापता हैं। दूसरी तरफ सिडनी मॉर्निग हेराल्ड ने शरणार्थियों की संख्या 200 बताई है, जिनमें से 33 को बचा लिए जाने का अखबार ने दावा किया है। इंडोनेशियाई अधिकारियों का कहना है कि खराब मौसम के कारण राहत व बचाव कार्य में मुश्किलें आ रही हैं। जाहिर है, मुल्क के भीतर के खराब हालात ने अफगानियों को अपनी जान जोखिम में डालकर भी संपन्न देशों की ओर कूच करने को प्रेरित किया है। यह वाकई एक बड़ी त्रसदी है। ऐसी कई घटनाएं पहले भी घट चुकी हैं और आगे भी घटेंगी। हर वर्ष हजारों की तादाद में अफगानी लोग गैर-कानूनी तरीके से दूसरे देशों की यात्रा करते हैं। वे दरअसल अफगानिस्तान की अंदरूनी बगावतों और रोजगार की किल्लत से बचकर भागना चाहते हैं। संपन्न देशों की सख्त आप्रवासन नीति के बावजूद हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों की ओर जाने वाले अफगानियों की संख्या में नाटकीय ढंग से बढ़ोतरी हुई है। साफ है, विश्व-बिरादरी की तमाम सहायता के बावजूद अफगानिस्तान की हुकूमत मुल्क में अपने बाशिंदों को सुरक्षा देने और उनकी जिंदगी बेहतर बनाने में बुरी तरह से नाकाम रही है।
डेली आउटलुक, अफगानिस्तान

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