DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एंकर पेज दो

आधी-अधूरी, बोझिल किताबें हटनी चाहिएबरेली। वरिष्ठ संवाददाता उन समझदार अभिभावकों को क्या कहें जो बच्चों के जन्म से पहले ही उसका भविष्य तय कर लेते हैं। बच्चों को डाक्टर बनाएंगे या इंजीनियर, इसे लेकर कई बार भावी माता-पिता में मीठी तकरार भी होती है। एक तरह से बच्चों की रुचि और क्षमताओं से पूरी तरह अनजान बने रहकर उसके खिलाफ जैसे एक साजिश सी शुरू हो जाती है। भावी बालक अभिभावक की अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति का विकल्प मात्र बनकर रह जाता है। इसके बाद शुरू होता है बालक के लिए बेहतर स्कूल के चयन का खेल (या कहें खिलवाड़)। प्राय: मंहगी फीस और भारी आडंबर वाले स्कूलों को हम विशिष्ट मान लेते हैं। किंतु अंध-व्यावसायिकता के नाम पर जब यहां सिलेबस को भी नहीं बख्शा जाता तो बडी कोफ्त होती है। यह बात दीगर है कि प्राइवेट स्कूल अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ कोर्स के नाम पर कमाते हैं। क्या मजाल कि किसी विशेष स्कूल की किताबें उसके द्वारा निर्दिष्ट दुकान के अलावा कहीं और मिल जाएं। यह कमीशनबाजी का खुला उदाहरण है। भले ही इस बहाने अभिभावक की जेब में जमकर चूना लगता हो किंतु इस व्यावसायिक मानसिकता का सबसे बड़ा खामियाजा भोगते हैं बेचारे बच्चों। इन्हें कोर्स के नाम पर मिलती हैं आधी-अधूरी, अमनोवैज्ञानिक और बोझिल किताबें, जिनका वर्तमान शैक्षिक पाठय़चर्या से कोई लेना देना नहीं होता। इनके लेखक-संपादक प्राय: अनुभवहीन होते हैं, पूरी तरह से तथाकथित प्रकाशकों के शोषण के शिकार। यह लेखक 25 से 50 रुपये पेज के हिसाब से इन पुस्तकों को तैयार करते हैं। जाहिर है कि ऐसे में लेखक से पर्याप्त सजगता एवं समर्पण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कई बार तो पुस्तकों में प्रकाशक का नाम-पता भी नहीं होता। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद भारत सरकार का एक महत्वपूर्ण संस्थान है और इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य ही शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर शोध कर उसे अधिकाधिक व्यावहारिक एवं प्रयोजनपरक बनाना है। संस्था के विद्वान एवं अनुभवी प्राध्यापक इस दिशा में सतत क्रियाशील भी हैं। अनेक सेमिनार, कार्यशालाओं तथा आमंत्रित प्रस्तावों द्वारा पाठयक्रम को समसामयिक एवं शिक्षा के विशिष्ट उद्देश्यों के अनुरूप बनाने का प्रयास किया जाता है। तुलनात्मक रूप से यह पुस्तकें न केवल सस्ती भी हैं बल्कि इनका प्रदेय दूरगामी है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की पुस्तकें छात्रों के लिए वरदान स्वरूप हैं। इनमें उनकी रुचि, क्रियाओं, अनुभवों और मनोवैज्ञानिक चिंतन का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। मेरे विचार में छात्रहित में अन्य निर्धारणों की तरह शासन को चाहिए कि सभी विद्यालयों में भी समान तथा एनसीईआरटी के पाठय़क्रम को अनिवार्य रूप से लागू करने की व्यवस्था करनी चाहिए।(आरपी डिग्री कालेज मीरगंज में बीएड के विभागाध्यक्ष और हिन्दी के प्रख्यात बाल साहित्यकार डा. नागेश पांडेय संजय से बातचीत पर आधारित)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: एंकर पेज दो