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जल्द आएगी माइंड रीडिंग मशीन

मस्तिष्क की जटिल गुत्थी सुलझाने की दिशा में वैज्ञानिक अब माइंड रीडिंग तकनीक निर्माण करने की दहलीज तक जा पहुंचे हैं। यह तकनीक भविष्य में इनसानी विचारों और उसकी देखी छवियों को स्क्रीन पर दिखाएगी। इससे जुड़े अनेक रोचक पहलुओं पर नजर डाल रहे हैं मुकुल व्यास

यदि दुनिया में चल रहे वैज्ञानिकों के प्रयोग सफल हो गए तो विज्ञान न सिर्फ आपके मस्तिष्क में बनने वाले चित्र देख लेगा, बल्कि आपके विचार भी पढ़ लेगा। मस्तिष्क को पढ़ने में वैज्ञानिकों को शुरुआती सफलता मिल भी गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ब्रेन इमेजिंग सेंटर के वैज्ञानिक जैक गैलंट और उनकी टीम ने मस्तिष्क में झांकने का एक हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया है। उन्होंने लोगों द्वारा देखे गए वीडियो के क्लिप्स को पुनर्निर्मित करने में सफलता प्राप्त की है।

गैलंट और उनके सहयोगी रिसर्चरों द्वारा किए गए प्रयोगों का विवरण ‘करंट बायोलॉजी’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। रिसर्चरों ने तीन व्यक्तियों को एफएमआरआई ब्रेन स्कैनर में लिटाकर उन्हें फिल्मों के ट्रेलर दिखाए। स्कैनर ने इन व्यक्तियों के मस्तिष्कों से निकलने वाले सिग्नलों को रिकॉर्ड किया, जिन्हें कंप्यूटर ने छवियों में बदल दिया। इनके नतीजे बहुत शानदार थे। पुनर्निर्मित फिल्म की क्लिप रेगिस्तान में भ्रमण करते हुए हाथियों की थी। कंप्यूटर स्क्रीन पर तस्वीर इतनी साफ नहीं थी, लेकिन उसे देखकर सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि चित्र के मुख्य पात्र हाथी ही हैं। अगर इसे किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से सीधे डाउनलोड की गई तस्वीर के रूप में देखें तो गैलंट की टीम द्वारा प्राप्त तस्वीर सचमुच लाजवाब थी।

गैलंट का उद्देश्य इन प्रयोगों के जरिये यह पता लगाना था कि मस्तिष्क का विजुअल कोर्टेक्स व्यक्ति द्वारा देखे गए चित्रों को कैसे रजिस्टर करता है। विजुअल कोर्टेक्स मस्तिष्क की पिछली तरफ होता है। हमारी आंखें जो देखती हैं, उसकी प्रोसेसिंग दिमाग के इसी हिस्से में होती है। विजुअल कोर्टेक्स एक कैमरे की तरह काम करता है। वह रेटिना के जरिये सारी सूचनाएं ग्रहण कर उन्हें मस्तिष्क में छवियों के रूप में अंकित करता है।

मस्तिष्क जो भी तस्वीर देखता है, उसके भीतर एक क्रिया होती है। इसका पैटर्न हर इमेज या तस्वीर के लिए अलग होता है। हजारों एफएमआरआई स्कैनों का विश्लेषण करके कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर आपके मस्तिष्क के खास पैटर्न की मैचिंग एक खास वस्तु से कर सकता है। वैज्ञानिक अब मस्तिष्क की गतिविधि का विश्लेषण कर उस चीज के बारे में लगभग सही अंदाजा लगा सकते हैं।

लंबा शोध
गैलंट गत दस वर्षों से अपनी लैब में ब्रेन इमेजिंग पर रिसर्च कर रहे हैं। वे दुनिया के उन चंद स्नायु वैज्ञानिकों में हैं, जो फंक्शनल मैग्नेटिक रिज़ोनेंस इमेजिंग (एफएमआरआई) स्कैन के जरिये ब्रेन पैटर्न का विश्लेषण करके मस्तिष्क को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि इस तकनीक से मस्तिष्क में संग्रहित छवियों को पुनर्निर्मित किया जा सकता है। मौजूदा विधि में विश्लेषण पर कई घंटे लग जाते हैं, लेकिन वे अपनी तकनीक को इतना पुख्ता करना चाहते हैं कि लोग जो कुछ देखें, उन्हें ब्रेन स्कैनरों से भी देख लिया जाए।

किसी के दिमाग से पिक्चर निकालने की क्षमता से भी बड़ी चुनौती उन विचारों को पता लगाने की है, जो तस्वीर के साथ जुड़े हों। चित्रों की रिकॉर्डिंग दिमाग के पिछले हिस्से में होती है और विचार कहीं और रिकॉर्ड होते हैं। कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंटिस्ट टॉम मिशैल और उनके सहयोगी मार्सेल जस्ट इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

मिशैल का ख्याल है कि दस वर्षो में वैज्ञानिक छवियों, शब्दों और भावनाओं से मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया को नापकर न सिर्फ तस्वीरों को डाउनलोड कर सकेंगे, बल्कि विचार भी पढ़ लेंगे। जापान के एडवांस्ड टेलिकम्युनिकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट में कार्यरत न्यूरो साइंटिस्ट युकीयासु कमीतानी इस तकनीक को और ऊंचा ले जाने को तत्पर हैं। उनका मानना है कि इस तकनीक से सपनों की गुत्थी सुलझाई जा सकती है।

अनेक सफलताएं
माइंड रीडिंग के लिए दुनिया के कई और वैज्ञानिक भी रिसर्च कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो की टीम ने इस साल मई में विजन से संबंधित ब्रेन सिग्नलों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की थी। प्रयोग में वालंटियर्स को लोगों के चेहरों की तस्वीरें दिखाई गई थीं। इन चेहरों में ख़ुशी और आश्चर्य व्यक्त करने वाले भाव थे। वैज्ञानिक यह दिखलाने में सफल रहे कि चेहरे के अलग हिस्सों को देखने पर भिन्न मस्तिष्क तरंगें निकलती हैं।

यूटा यूनिवर्सिटी के बायोइंजीनियरों ने एक मरीज को दस शब्द पढ़ने को कहा। जैसे ही मरीज ने ये शब्द पढ़ने शुरू किए, उन्होंने कंप्यूटर में ब्रेन सिग्नलों को रिकॉर्ड करना शुरू किया। ये शब्द थे : यस, नो, हॉट, कोल्ड, हंगरी, थ्रर्स्टी, हेलो, गुडबाय, मोर और लैस्स। उन्होंने मरीज से कंप्यूटर के सम्मुख इन शब्दों को दोहराने को कहा। बायोइंजीनियरों की टीम प्रत्येक शब्द के लिए ब्रेन सिग्नल को मैच करने में कामयाब रही। यह तकनीक लकवाग्रस्त व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सकती है।

कनाडा के वैज्ञानिकों ने जून में माइंड रीडिंग की एक और तकनीक में सफलता का दावा किया था। वे ब्रेन स्केन के आधार पर यह बताने में कामयाब रहे कि आदमी की अगली शारीरिक गतिविधि क्या होगी? उन्हें उम्मीद है कि इस टेक्नोलॉजी के आधार पर उन्नत किस्म के कृत्रिम पैर और भुजाएं विकसित करना संभव हो सकेगा। कार निर्माता टोयोटा ने कुछ समय पहले यह बताया था कि उसके रिसर्चर एक ऐसा न्यूरोन हेलमेट विकसित कर रहे हैं, जिसके जरिये बाइक सवार सिर्फ अपने दिमाग से गियर बदल सकता है, यह हेलमेट दिल की धड़कन और स्पीड पर भी नजर रख सकता है।

यदि ये सारे प्रयोग कामयाब रहे तो काम करने के हमारे तौर-तरीकों में भारी बदलाव आ जाएंगे। मस्तिष्क पढ़ने वाली मशीनों की मदद से डॉक्टर मनोविकारों से ग्रस्त लोगों के मस्तिष्क में झांक सकेंगे और उनका इलाज खोज सकेंगे, अपराधियों के मन टटोले जा सकेंगे, लेकिन इस टेक्नोलॉजी से कई नैतिक सवाल खड़े हो सकते हैं। कुछ लोग इससे चिंतित हैं कि माइंड रीडिंग मशीनें बन जाने के बाद प्राइवेसी खत्म हो जाएगी। कोई भी हमारे निजी विचार उड़ा सकेगा या दिमाग की हैकिंग ही कर डालेगा!

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