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जिन्ना के पाखंड पर दलवाई की नजर

लगभग 15 साल पहले मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन के नजदीक एक पटरी पर मैं हमीद दलवाई से टकराया था। वहां एक गहरे रंग के पत्थर पर पड़ी उनकी किताब मुस्लिम पॉलिटिक्स इन इंडिया पर मेरी निगाह अचानक जा टिकी थी और मैंने शायद 20 रुपये में उसे खरीदा व अपने साथ बंगलुरु ले आया था। तब से अब तक मैं इस किताब को कम से कम आधा दजर्न बार पढ़ चुका हूं।

हालांकि दलवाई के बारे में आज लोग कम जानते हैं, लेकिन मेरी राय में वह संभवत: भारतीय मुस्लिम वर्ग से निकले सबसे साहसी चिंतक थे। कोंकण में पैदा हुए दलवाई युवावस्था में मुंबई चले आए थे और फिर वहां की वामपंथी राजनीति में शामिल हो गए थे। उन्होंने कई उम्दा लघु कहानियां लिखी थीं, बल्कि कुछ बेहतरीन राजनीतिक लेख भी लिखे थे, जिनका अनुवाद उनके दोस्त दिलीप चित्रे ने किया और उसे मुस्लिम पॉलिटिक्स इन इंडिया शीर्षक से किताब की शक्ल में प्रकाशित कराया।

यह किताब मुस्लिम प्रतिक्रियावादियों और हिंदू रूढ़िवादियों, दोनों की कलई खोलती है और सभी धर्मों व संप्रदायों के उदारवादियों से अपील करती है कि वे एक साथ आएं और एक धर्मनिरपेक्ष, बहुलवादी आधुनिक भारत का निर्माण करें।
जब मैंने भारतीय राजनीतिक चिंतन के एक संकलन में दलवाई के काम को शामिल किया था, तो कुछ आलोचक हैरान रह गए थे।

कई अन्य तो नाराज हो गए थे। उनकी नाराजगी की दो वजहें थीं। एक, मैंने एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख किया था, जिन्हें वे नहीं जानते थे और दूसरी वजह यह थी कि मैंने मौलाना आजाद को संकलन में शामिल नहीं किया था। यह सही है कि दलवाई को आज लगभग भुला दिया गया है। इसकी वजह कुछ हद तक यह हो सकती है कि चालीस वर्ष पूरे करने के कुछ ही साल बाद उनकी मृत्यु हो गई।
जहां तक मौलाना आजाद से अधिक दलवाई को अधिक तवज्जो देने की बात थी, तो इसके पीछे तथ्य यह था कि हालांकि मौलाना आजाद एक महान विद्वान और राष्ट्रवादी नेता थे, लेकिन उनकी लेखनी वास्तव में मौजूदा समस्याओं को अभिव्यक्त नहीं करती।

दलवाई के चिंतन के प्रति मेरा आकर्षण बाद में छपे उनके एक लेख से और मजबूत हुआ। इस लेख का अनुवाद भी दिलीप चित्रे ने किया है, जो 1973 में प्रकाशित हुआ था। इसे मैंने हाल ही में क्वेस्ट  पत्रिका में पढ़ा है। इस लेख में दलवाई लिखते हैं, ‘बांग्लादेश का उदय मोहम्मद अली जिन्ना के महान सपने पर एक निर्णायक प्रहार था।’

इसके बाद वह उस धारणा की कलई खोलते हैं, जो यह कहती रही है कि जिन्ना एक सेकुलर व आधुनिक सोच वाले उदारवादी नेता थे और हिंदू कट्टरपंथियों तथा खास तौर पर गांधी व नेहरू ने उन्हें मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान मांगने के लिए विवश किया था। दलवाई दो घटनाओं का जिक्र करते हैं: एक, वर्ष 1916 के लखनऊ पैक्ट का और दूसरी, 1946 के कैबिनेट मिशन का।

वह रेखांकित करते हैं कि ‘यदि जिन्ना का इरादा (जैसा कि उनके समर्थक दावा करते हैं) हिंदुओं के साथ मिलकर औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष करने का था, तब तो उन्हें लखनऊ पैक्ट के बाद अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई के केंद्र में होना चाहिए था। लेकिन इसके उलट दिखता यह है कि जिन्ना उस वक्त यह आकलन करने में जुटे थे कि ब्रिटिश क्या कुछ छूट देने के लिए राजी हो सकते हैं और इन रियायतों में मुसलमानों को कितना हिस्सा मांगना चाहिए।’

कैबिनेट मिशन के संदर्भ में दलवाई की दलील थी कि जिन्ना ने इस योजना को इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि ‘यह न सिर्फ मुसलमानों को अपने बहुमत वाले सूबों में सियासी पावर के उपभोग में सक्षम बना रही थी, बल्कि केंद्र में भी उन्हें पचास फीसदी आरक्षण मुहैया करा रही थी और इस तरह हिंदू बहुमत पर हुकूमत करने का उनका रास्ता साफ हो रहा था।’

जिन्ना ने इस योजना का इसलिए भी स्वागत किया, क्योंकि कैबिनेट मिशन योजना देसी रजवाड़ों को उनका स्वतंत्र दर्जा दे रही थी और जिन्ना ने सोचा कि वह ‘मुस्लिम भारत’ और ‘रजवाड़ों वाले भारत’ का इस्तेमाल ‘हिंदू भारत’ को नियंत्रित करने के लिए कर सकेंगे।

संशोधनवादी और अतीतजीवी इतिहासकार गांधी और नेहरू पर इस बात के लिए तोहमत मढ़ते हैं कि वे कैबिनेट मिशन योजना पर सहमत नहीं हुए और यदि उन्होंने उसे मान लिया होता, तो भारत आज एक रहता। दलवाई यह मानते हैं, ‘यदि गांधी और नेहरू ने जिन्ना की मांगें मान ली होतीं, तो मुल्क का बंटवारा टल सकता था।’ हालांकि उन्होंने बड़ी बेबाकी से यह भी लिखा कि ‘गांधी और नेहरू की पहली प्राथमिकता यह नहीं थी कि ‘किसी भी कीमत पर’ देश का विभाजन रोका जाए। यदि विभाजन टालने के लिए कोई भी कीमत चुकाई जाती, तो सभी भारतीयों को या तो इस्लाम कुबूलना पड़ता या फिर उन्हें हिंदुत्व की दीक्षा लेनी पड़ती।’

इसके बाद दलवाई गांधी और जिन्ना की ऐतिहासिक विरासत की बात करते हैं। 1973 में प्रकाशित इस लेख में वह लिखते हैं कि ‘प्रगतिशील बुद्धिजीवी गांधी को एक पुनर्जागरणवादी और जिन्ना को आधुनिकतावादी के रूप में देखते थे। पर जरा गौर कीजिए, गांधी के पुनर्जागरणवादी हिन्दुस्तान में अल्पसंख्यक कम से कम जी सकते हैं और इस मुल्क का आईन सेकुलर है। एक आधुनिक देश बनने का यह गंभीर प्रयास कर रहा है। 16 भाषाओं और करीब 800 बोलियों के साथ यह बहुजातीय व बहुलवादी मुल्क अब भी एकजुट है। हिन्दुस्तान ने अपनी सरहद के भीतर की तमाम महिलाओं को बगैर किसी आंदोलन के वोट देने का हक दिया है।’

वह आगे लिखते हैं, ‘जिन्ना ने एक ऐसे पाकिस्तान का गठन किया, जो गैर-धर्मनिरपेक्ष व गैर-जम्हूरी मुल्क की दिशा में मुड़ गया है। अपने गठन के महज दो महीने के भीतर वहां के 50 फीसदी हिंदुओं को मुल्क छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया गया। पाकिस्तान खुद एक इस्लामी देश बन गया, जहां लोकतंत्र का कोई निशान नहीं दिखता। वह आज तक अपनी कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं पा सका है।’ दलवाई सवाल करते हैं, ‘यदि जिन्ना एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शख्स थे, तो क्यों पाकिस्तान में आज भी बालिग लोगों को मताधिकार हासिल नहीं है?’

दलवाई जिन्ना के कैरियर को लेकर अपने लेख का अंत एक संक्षिप्त विश्लेषण के साथ करते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि दिल्ली में शहीद होने से पहले गांधी अपने अंतिम दिनों में भी मुल्क में फैली हिंसा की आग को शांत करने में लगे रहे। कोलकाता में उन्हें कामयाबी भी मिली। दूसरी तरफ, जब 1947 की सर्दियों में पूरे भारत और पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा भड़की हुई थी, तब जिन्ना ने ‘गांधी के साथ शांति की अपील के मसौदे पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था।’

दलवाई लिखते हैं कि जिन्ना ने उन दिनों गवर्नर जनरल हाउस से बाहर कदम ही नहीं रखा। बल्कि उन्होंने जब गांधी की हत्या के बारे में सुना, तो अपने ऊपर भी खतरे से डरकर यह आदेश दिया कि तत्काल उनके मैंशन के आगे मजबूत दीवार खड़ी की जाए। बकौल दलवाई, ‘ये तथ्य बताते हैं कि जिन्ना या तो नैतिकतावादी कायर थे या फिर राजनीतिक पाखंडी। और इनमें से किसी भी सूरत में मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी चिंता दरअसल खोखली ही थी।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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