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धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी

अदम गोंडवी एक ऐसी सैर पर निकल गए, जहां बस पुकार पहुंचती है, आकार नहीं। उनकी गजलें हमारे वक्त के अनगाए विक्षोभ की उन तरंगों की तरह थीं, जो चेतना के जमे हुए बेशर्म पानी में असहमति की हिलोर उठाती हैं। असहमति की छटपटाहट और उसकी तल्खियां जब उनके शेरों में पूरी तरह न समा सकीं तो उन्होंने शायद थक-हार कर अमृत-रूप हो जाने से पहले के उस हलाहल में भी शरण पायी, जो देवताओं तक को बरगला देता है।

शनिवार की सुबह उनके पुत्र से उनका हाल-चाल और आवश्यक सुविधाओं के बारे में जानकारी लेते समय मैंने उसे बड़े भाई की तरह हिदायत दी थी, कि मुझे पता चला है, कि भाई साहब किसी से ‘दो बूँद जि़न्दगी की’ मांग रहे थे। उसे बहुत चौकन्ना रहने की सलाह देते हुए मैंने कहा था कि वो तुम्हारी ही जि़म्मेदारी नहीं हैं, असहमति में उठे हर हाथ के प्रणाम हैं। उनके स्वास्थ्य में सुधार की खबरें हर पल आती थीं, उम्मीद बांध रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन दिन निकला तो उनके उठ चलने के शोर के साथ सन्नाटा था... पता नहीं कब हम सब मिल कर अदम साहब के इस शेर को ख़ारिज कर पाएंगे-

‘आप आएं तो कभी गावों की चौपालों में
मैं रहूँ या न रहूँ, भूख मेजबाँ होगी।’
अदम जी के बारे में यह निर्मम समाचार मुझे तब मिला जब मैं अपने गीत-कुल के एक और आदरणीय को अलविदा कह रहा था। धर्मवीर भारती के बाद मेरे सर्वाधिक प्रिय गीतकार थे भारत भूषण यानी भारत दादा। भौगोलिक सीमाएं, कला-चेतना को कभी कभी बाँधने की बजाए विस्तृत भी करती है, ये मुझे तब पता चला जब मेरे मन में भारत दादा के ‘अपने जिले’ का होने को लेकर एक प्रकार का आत्म-विश्वास जागा। मेरे शुरुआती गीतों में भारती जी के साथ-साथ उनके गीत-बिम्ब तैरते-उतरते साफ़ दिखते हैं। कवि-सम्मेलनों का शुरुआती दौर था।

क्षेत्रीय कवि-सम्मेलनों की आधी रात की बोझिल पलकों पर जब भारत दादा के गीत अपने मोर-पंखी रंग बिखेरते, तो उनके लाख कहने पर भी, कि ‘तू मन अनमना न कर अपना’, मन अनमना हो ही जाता था। दर्जनों बार उत्तर-प्रदेश रोडवेज़ की बसों में चार अनगाये गीत उनको सूना दूं, या एक-दो उनके सुन लूं, इसी उम्मीद में अपना और उनका सूटकेस उठाये उनके साथ यात्राएं करता रहा। 1989 के मेरे पहले संयोजन में हुए कवि-सम्मलेन के वे प्रमुख कवि थे। जीवन की कई असंगतियों पर भारत दादा ने गीत मढ़े। जग भर की अपेक्षाओं पर खरे उतरने की दैवीय जद्दो-ज़हद में डूबे राम को अद्भुत जल-समाधि दी। रविवार सुबह-सुबह पता चला कि काल से उनकी ताल असंगत हो गयी। वे पहले ही कह गए थे-
‘तू मन अनमना न कर अपना
इसमें कुछ दोष नहीं तेरा
धरती के कागज़ पर मेरी
तस्वीर अधूरी रहनी थी...’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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