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बाबू का जाल, क्या बचेगा लोकपाल

भारत में बाबू का जो महत्व है, दुनिया जहान में नहीं है। पढ़ाई के दौरान हमें मुगालता था कि महत्वपूर्ण छात्र-यूनियन के पदाधिकारी हैं। जब मन आया प्रॉक्टर को हड़काया, जब मूड हुआ वाइस चांसलर को। किसकी मजाल कि उन से चूं-चपड़ करें। पढ़ाई के पश्चात ‘तलाशे-रोजगार’ की बेगार के दौरान अहसास हुआ कि बाबू का क्या जादू है। पैसे लेकर, नौकरी का फॉर्म देने में वह ऐसा ड्रामा करता, जैसे हम और हमारे पूरे खानदान पर कोई निजी अहसान कर रहा है। उन्हीं दिनों से हमें यकीन है। महाभारत के लिये धृतराष्ट्र को व्यर्थ दोष दिया जाता है। कौरवों-पांडवों को भिड़ाने में शर्तिया किसी बाबू का हाथ रहा होगा। एक परिचित सरकारी दोस्त बताते हैं कि जब तक आला दर्जे का लफाड़िया-बवालिया न हो, बाबू कतई कागजी शेर है।

अंग्रेजी हुकूमत में बाबू को कौन जानता था? बस गोरे साहब बहादुर छाए थे। उनसे जनता खौफ खाती। काम पड़ता, तो गुण भी गाती। आज बाबू का महत्व है, क्योंकि वह बेकाबू है। वेतन उसका जेब खर्च है, ऊपरी आमदनी मौरूसी हक! नीचे से ऊपर तक सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वह भी क्या करें? तुरन्ता संस्कृति वर्तमान समय का युग-मंत्र ही नहीं, मर्ज भी है। सत्ताधारी इसी के मरीज हैं। सब्र, संतोष, सिद्धांत वगैरह गए-गुजरे वख्त के गुण थे। आज पिछड़ेपन के दकियानूसी लक्षण हैं। इसीलिए शुभचिंतक, ऐसों को मनोचिकित्सक से इलाज की सलाह देते हैं।जाहिर है कि पैसा-आतुर, सरकारी नौकरी में आते बाद में हैं, कार, कोठी, कैश की हसरत में सत्ता की कुरसी को कुतरने के ख्वाब पहले बुनते हैं।

वह तो जनता धैर्यवान है। उसे नियति में विश्वास है। कुछ नेकनीयती कभी तो दिखाएगा ऊपर वाला। नहीं तो कौन जाने, अहिंसक विरोध कब का हिंसक बन चुका होता। सुर्खियों में छाता कि कल फलाने बड़े बाबू पिटे थे, आज ठिकाने। ताज्जुब नहीं, सरकार पिटाई-भत्ते का प्रावधान करती। यों काम में हों न हों, भ्रष्ट बाबू आकाओं को पटाने में उस्ताद हैं। भविष्य के लोकपाल भी इसी समाज की उपज हैं। वह कौन देवलोक से पधारनेवाले हैं! अपना इकलौता डर है। उन्हेंअगर बाबुओं ने जाल में फंसा लिया, तो अपने ‘सदाचारी सदा सुखी’ के सपने का क्या होगा।
गोपाल चतुर्वेदी

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