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हम सब भारतीय

आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) पर आधारित एक शोध का यह कहना है कि भारत में आर्यों का आक्रमण या आगमन एक मिथक है। हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) ने कुछ और संस्थानों के साथ मिलकर यह शोध किया है।

इस शोध के मुताबिक, भारतीय जनसंख्या की कोशिकाओं का जो जेनेटिक ढांचा है, वह काफी पुराना है और इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलते कि 3,500 वर्ष पहले कोई नई नस्ल बड़े पैमाने पर भारत आई थी। इसके पहले जेनेटिक्स के ही प्रमाणों के आधार पर यह माना गया था कि आर्यों का आक्रमण हुआ था। ताजा शोध ज्यादा आधुनिक तकनीकों पर आधारित है, इसलिए उसके ज्यादा प्रामाणिक होने का दावा किया गया है।

आर्यों के बाहर से आने का सिद्धांत 19वीं शताब्दी में महान भारतविद मैक्समूलर ने रखा था। मैक्समूलर ने वेदों और दूसरे ग्रंथों के आधार पर यह सिद्धांत बनाया था। कई भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में भारी समानता है, इसलिए 19वीं शताब्दी के विद्वानों ने इंडो-यूरोपियन या भारोपीय भाषा परिवार की अवधारणा सामने रखी। मोटे तौर पर माना यह गया कि भारत के उत्तरी हिस्से में बसने वाले, मध्य एशियाई और यूरोपीय लोगों के ज्यादातर पूर्वज एक नस्ल के थे, इन्हें आर्य कहा गया। आर्य नस्ल का सिद्धांत आज कोई नहीं मानता है, लेकिन उसके राजनीतिक परिणाम काफी भयावह हुए। हिटलर ने आर्य नस्ल की श्रेष्ठता के आधार पर ही दूसरा महायुद्ध लड़ा। भारत में उत्तर और दक्षिण के बीच भेद को आर्य-द्रविड़ संघर्ष बना दिया गया।

दरअसल मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की 1920 के आसपास खोज ने मामला और उलझा दिया। वह एक उन्नत सभ्यता थी, जिसे वैदिक काल से भी पहले का माना गया। इस पर अलग-अलग मत बनते गए। सबसे विस्फोटक मत यह था कि पश्चिम से आर्यो के आक्रमण ने सिंधु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर दिया और वे लोग दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिए गए। उत्तर-दक्षिण भारत के बीच यह झगड़ा एक वक्त में अलगाववाद की हद तक पहुंच गया। इस बीच कई मत प्रचलित रहे, लेकिन ज्यादा प्रचलित धारणा यह है कि कई आर्य कबीले पश्चिम से आकर भारत में समाते चले गए, कोई भीषण युद्ध या नस्ली नरसंहार नहीं हुआ।
यह बहस अकादमिक रहती तब भी गनीमत थी, इसमें राजनीतिक एजेंडे भी शामिल हो गए हैं।

एक वर्ग का मानना है कि यूरोपीय पूर्वाग्रह की वजह से पश्चिम से आने की बात हुई है। सारे भारतीय काफी पहले से ही यहां बसे हुए हैं। बल्कि भारत से पश्चिम की ओर ही लोग गए हैं। नई खोज यह कहती है कि भारत के सारे निवासियों का जेनेटिक ढांचा लगभग मिलता-जुलता है और यह भी साबित होता है कि लगभग 60,000 वर्षो से कोई बड़ी और अलग नस्ल भारत नहीं आई है। इस खोज का भी दावा है कि भारत से लोग मध्य-एशिया की ओर गए थे।

इस शोध की जांच अभी विभिन्न अनुशासनों के विद्वान करेंगे और उसे पुरातत्व, भाषाशास्त्र वगैरा से प्राप्त प्रमाणों के साथ रखकर भी देखेंगे। वास्तविकता यह है कि भारत के  ही नहीं, दुनिया के किसी भी इलाके के इतिहास में कई सारे खाली स्थान हैं, कई गुत्थियां हैं, जो अब तक सुलझी नहीं हैं। विज्ञान की तरक्की और नए शोधों से कुछ गुत्थियां सुलझ सकती हैं, या कुछ ऐसे तथ्य गलत सिद्ध हो सकते हैं, जिन्हें अकाटय़ मान लिया गया है।

जरूरत यह है कि दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, इतिहास के खाली स्थान विचारधारा से न भरे जाएं और अपने आग्रहों को तथ्य न मान लिया जाए। आज के झगड़ों में हजारों साल पुराने पुरखों को घसीटना किसी भी तरह से जायज नहीं है।

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