DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बदलाव की आंधी का एक साल

एक साल पहले फल विक्रेता मोहम्मद बुअजीजी ने ट्यूनीशिया में खुद को आग के हवाले कर दिया था। इसी घटना से चिनगारी भड़की, जिसने अविश्वसनीय क्रांति का रूप ले लिया। इसे अरब उद्भव भी कहा गया। दरअसल, शुरू में विशेषज्ञ इसे दुनिया के दूसरे हिस्सों में हो रहे सियासी व सामाजिक बदलाव से जोड़ रहे थे। तब कई मुल्कों में तानाशाही व्यवस्था के अंत की शुरुआत हो गई थी। इसमें पूर्व सोवियत देशों, पूर्वी एशिया व लातिन अमेरिका के देश भी शामिल थे।

वैसे विशेषज्ञों की राय तर्कसंगत ही हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया के देश उसी रास्ते पर गए, जिस पर वे सभी देश चल चुके थे। यानी तानाशाही और आर्थिक स्थिरता से निकलकर मुक्त चुनाव, बाजार व वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाना। एक साल बाद अब यह साफ हो गया है कि अरब क्रांति कुछ मायने में अलग थी। इसे उद्भव शब्द से जोड़ा जाना ठीक नहीं था। 1980 के बाद दुनिया के दूसरे हिस्सों में लोकतांत्रिक परिवर्तन हुए, वे मोटे तौर पर शांतिपूर्ण ही थे।
फिलीपींस से लेकर चिली तक में तानाशाही खत्म हुई और ‘लोकशक्ति’ का जन्म हुआ। पर इस साल ट्यूनीशिया और मिस्र में कुछ और ही मिसाल देखने को मिली। लगातार कई महीनों तक हत्याओं का सिलसिला चला। लेकिन लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी, सीरिया में बशर-अल-असद और यमन में अली अब्दुल्ला सालेह ने जनता के सामने झुकने की बजाय लड़ने का फैसला लिया। आखिरी दम तक लड़ने का फैसला! वैसे गद्दाफी की सत्ता मिटियामेट हो चुकी है। असद और सालेह की सत्ता भी इसी राह पर है। लेकिन जो हजारों हत्याएं हुई हैं, उनसे ये देश पूरी तरह से टूट गए हैं।

कोई नहीं जानता कि कब और कैसे हत्याओं का यह दौर थमेगा? अब नव मुक्त देशों की आर्थिक भविष्य को लेकर भी चिंता हो रही है, जो अन्य क्रांतियों के नतीजों से अलग है। पूर्वी यूरोपीय व एशियाई देशों ने उदारवादी बाजार की नीतियों को अपनाया। इससे उनकी अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हुईं। पर मिस्र व दूसरे अरब मुल्क विदेशी निवेश की नीतियों को खारिज करते हैं।
द वाशिंगटन पोस्ट, अमेरिका

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बदलाव की आंधी का एक साल