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अस्पतालों का हाल

पिछले दिनों कोलकाता के एक अस्पताल में लगी आग से जुड़ी  खबर पढ़ने को मिली। इस तरह के हादसों की जितनी निंदा की जाए,  वह कम ही है। देश भर में ऐसे कई  अस्पताल हैं, जहां लापरवाही बरती जा रही है। इसलिए अस्पतालों की नियमित जांच होनी चाहिए। वहां आपदा प्रबंधन की क्या व्यवस्थाएं हैं, आपत स्थितियों का सामना करने में उनके कर्मचारी सक्षम हैं या नहीं, इन सबकी पड़ताल हो। कोलकाता अग्निकांड के जिम्मेदार लोगों को बख्शना, पीड़ित परिवारों के साथ नाइंसाफी ही होगी। 
श्याम सुन्दर, संजय बस्ती, तिमारपुर, दिल्ली

खुदकुशी के मामले
हर साल की तरह इस साल भी किसानों की खुदकुशी के मामले थम नहीं पाए। इस साल भी सबसे ज्यादा खुदकुशी महाराष्ट्र के किसानों ने ही की है। जानकार बताते हैं कि इन आत्महत्याओं के पीछे सूखा, खराब बीज, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना या फसल नष्ट हो जाना आदि वजहें हैं। इनके अलावा कई किसान ऋण न चुका पाने के चलते भी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। कृषि मंत्री शरद पवार महाराष्ट्र के ही हैं। फिर भी किसानों के दुख घट नहीं रहे हैं। वहां के किसान कपास का समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने के लिए कई महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। आखिर कब तक किसान मौत को गले लगाते रहेंगे? कब तक उनके हितों की अनदेखी होती रहेगी? कृषि की दोषपूर्ण नीतियों की समीक्षा क्यों नहीं होती? कृषि भवन के एसी  कमरों में योजना बनाने वाले अधिकारी फटेहाल किसानों का दुख-दर्द कब समझोंगे?
जसवंत सिंह, नई दिल्ली

संसद को बाधित न करें
हमारे भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था भ्रष्टाचार जैसे राक्षस से तंग आकर बिखरती जा रही है, वहीं हमारे राजनेता अहम मुद्दों पर संसद में बहस के लिए कतई तैयार नहीं दिख रहे। इससे आम जनता और देश का नुकसान हो रहा है। लगता है कि राजनेताओं को देश के विकास की चिंता नहीं है। अगर वे चाहें, तो स्वार्थ भावना से ऊपर उठकर संसद में शिष्ट तरीके से समस्याओं को सुलझा सकते हैं, पर वे आरोप-प्रत्यारोप के जरिये संसदीय कार्यवाही को ठप करते हैं। जनता वाकिफ है कि संसदीय कार्यवाही पर प्रतिदिन करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। पिछले साल भी शीतकालीन सत्र पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बह गए। इस तरह हो रहे आर्थिक नुकसान की भरपाई आखिर कौन करेगा? क्या यह देश की आर्थिक विकास में बाधा नहीं है? इससे जनता के बीच नेताओं की छवि धूमिल होती जा रही है। यही परिस्थितियां रहीं, तो आगामी चुनाव में जनता प्रतिनिधियों को धूल चटाने से कसर नहीं छोड़ेगी।
मुकेश कुमार साह, दिल्ली

भारत रत्न का रास्ता साफ
भारत सरकार ने भारत रत्न की नियमावली में बदलाव किए हैं। अब इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान के दायरे में खिलाड़ी भी शामिल हो गए हैं। इससे पहले कला, साहित्य, समाजसेवा और विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया जाता था। बहरहाल, नियमों में बदलाव के बाद अब मेजर ध्यानचंद और सचिन जैसे खिलाड़ियों के लिए यह पुरस्कार पाने का रास्ता साफ हो गया है। वैसे भी सचिन तेंदुलकर का क्रिकेट के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान है। लगभग सारे रिकॉर्ड उन्हीं के नाम हैं। ऐसे में उन्हें भारत रत्न से नवाजा जाना चाहिए। मेजर ध्यानचंद तो हॉकी के जादूगर थे, जिन्हें हमारी पीढ़ी ने खेलते हुए नहीं देखा। लेकिन इससे उनके योगदान घट नहीं जाते। सरकार को उन्हें भी सचिन के साथ-साथ भारत रत्न से नवाजना चाहिए।
सुशील, विवेक विहार, दिल्ली

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