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गोवा, दमन-दीव इस तरह हुए विदेशियों से मुक्त

भारत को यूं तो 1947 में ही आजादी मिल गई थी, लेकिन इसके 14 साल बाद भी गोवा पर पुर्तगालियों का शासन था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के बाऱ बार के आग्रह के बावजूद पुर्तगाली झुकने को तैयार नहीं हुए। उस समय दमन दीव भी गोवा का हिस्सा था।

पुर्तगाली यह सोचकर बैठे थे कि भारत शक्ति के इस्तेमाल की हमेशा निन्दा करता रहा है, इसलिए वह हमला नहीं करेगा। उनके इस हठ को देखते हुए नेहरू और मेनन को कहना पड़ा कि यदि सभी राजनयिक प्रयास विफल हुए तो भारत के पास ताकत का इस्तेमाल ही एकमात्र विकल्प रह जाएगा।

पुर्तगाल जब किसी तरह नहीं माना तो नवम्बर 1961 में भारतीय सेना के तीनों अंगों को युद्ध के लिए तैयार हो जाने के आदेश मिले। मेजर जनरल केपी कैंडेथ को 17 इन्फैंट्री डिवीजन और 50 पैरा ब्रिगेड का प्रभार मिला।
भारतीय सेना की तैयारियों के बावजूद पुर्तगालियों की हेकड़ी नहीं गई। भारतीय वायु सेना के पास उस समय छह हंटर स्क्वाड्रन और चार कैनबरा स्क्वाड्रन थे।

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