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स्वर्णयुग की समाप्ति

ठीक तीस बरस पहले सलमान रश्दी का उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ प्रकाशित हुआ और इसके साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय अंग्रेजी लेखन का दौर शुरू हुआ था। भारतीय लेखकों को लाखों डॉलर्स की अनुबंध राशि मिलने लगी और तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। अब यह दौर उतार पर है और पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश के लेखकों की धूम है। साहित्य के बाजार और ग्लैमर के इस उतार-चढ़ाव पर प्रभात रंजन की पैनी नज़र

पिछले साल अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी लेखक दानियाल मुइनुद्दीन का कहानी संग्रह आया था- ‘इन अदर रूम्स, अदर वल्र्डस’। भारत में इसे रैंडम हाउस ने छापा था। कहा जाता है कि इस किताब में दुनिया भर के कम से कम 10 मशहूर प्रकाशकों ने दिलचस्पी दिखाई। अंतत: उसके प्रकाशन अधिकार की नीलामी की गई।

सबसे अधिक बोली लगाने वाले जिस अमेरिकी प्रकाशक को उसे छापने का अधिकार मिला, उसे करोड़ों रुपए इसके एवज में देने पड़े। उसने उस कहानी संग्रह को विज्ञापित करते हुए यह घोषणा की कि पाकिस्तान के कट्टरपंथी समाज से एक ऐसा लेखक आया है, जिसकी लेखन शैली में विलियम फॉकनर और इवान तुर्गनेव का मिला-जुला रूप दिखाई देता है।

केवल दानियाल मुइनुद्दीन ही क्यों, हाल के वर्षों में अनेक पाकिस्तानी लेखक-लेखिकाओं को लेकर अंग्रेजी कथा-जगत में इस तरह की घोषणाएं की जाती रही हैं। मोहसिन हामिद, जिनके उपन्यास ‘रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट’ को बुकर के लिए नामांकित भी किया गया था (और अब उस पर एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फिल्म भी बन रही है), मोहम्मद हनीफ, कमिला शम्सी, फातिमा भुट्टो जैसे नाम इस समय पाकिस्तानी अंग्रेजी साहित्य के बिकाऊ और चमकते चेहरे हैं। यह 9/11 की घटना के बाद का साहित्यिक परिदृश्य है। दुनिया भर में पाठकों का झुकाव संघर्षरत, समस्याग्रस्त मुस्लिम देशों की कथाओं की ओर हुआ है।

अफगानिस्तान मूल के अमेरिकी लेखक खालिद हुसैनी ने जब अफगानिस्तान की पृष्ठभूमि में ‘काइट रनर’ और ‘द थाउजेंड स्प्लेंडिड सन’ जैसे उपन्यास लिखे तो उनको लेकर भी प्रकाशकों-पाठकों में बहुत उत्साह दिखा। आजकल बंगलादेश के लेखकों की कृतियों में भी दिलचस्पी जगने लगी है। ‘गुड मुस्लिम’ वाली तहमीना अमन का नाम उनमें सबसे प्रमुखता से लिया जा सकता है। इन देशों के युवा लेखक अंग्रेजी साहित्य का नया मुहावरा गढ़ने में लगे हैं।

यह महज संयोग है कि यह साल सलमान रश्दी के उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ के प्रकाशन का 30वां साल है। कहा जाता है कि इस उपन्यास के प्रकाशन ने भारतीय अंग्रेजी साहित्य के लिए वही काम किया, जो गाब्रियल गार्सिया माख्रेज के उपन्यास ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिटय़ूड’ के प्रकाशन ने स्पैनिश भाषा के साहित्य के लिए किया था। 1980 और 90 के दशक में भारतीय अंग्रेजी लेखक छाये रहे। सलमान रश्दी के अलावा, अमिताव घोष, विक्रम सेठ जैसे लेखक 80 के दशक में छाये रहे।

90 के दशक में और उसके बाद के दौर में अरुंधती राय, पंकज मिश्र, राजकमल झा, विक्रम चंद्रा कुछ ऐसे लेखक रहे, जिनकी चर्चा मोटी एडवांस राशि के लिए भी हुई। इसमें अरुंधती राय को बुकर भी मिला। बाद के दौर में किरण देसाई और अरविंद अडिगा को भी बुकर पुरस्कार मिला, लेकिन इनके उपन्यासों को वह ख्याति और आलोचकीय सम्मान नहीं मिले, जो सलमान रश्दी और अरुंधती राय के उपन्यासों को मिले थे।

ये तीन दशक भारतीय अंग्रेजी लेखन के लिए स्वर्ण काल की तरह थे। कहा जाता है कि इस दौर में केवल भारतीय नाम होना ही अपने आप में उपन्यास की सफलता के लिए काफी माना जाता था। प्रश्न यह उठता है कि जब इतना बड़ा बाजार था, इतने व्यापक स्तर पर पाठक थे तो भारतीय अंग्रेजी लेखन से लोगों का ध्यान हटने क्यों लगा? यह एक अजीब संयोग है कि भारतीय समाज और राजनीति की विडंबनाएं भारतीय-अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं में नहीं दिखाई देती हैं।

अमिताव कुमार ने अपनी पुस्तक ‘बॉम्बे, लंदन, न्यूयॉर्क’ में इस संबंध में महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। वे लिखते हैं कि ज्यादातर भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों में भारतीय जन-जीवन नहीं आता है। अगर आता भी है तो सतही तौर पर। वे सलमान रश्दी के उपन्यास ‘ग्राउंड बिनीथ हर फीट’ का उदाहरण देते हैं। उपन्यास में पीलू दूधवाला नामक एक प्रांतीय नेता है। उसके चरित्र की एकमात्र विशेषता लेखक उपन्यास में बताता है कि वह गलत अंग्रेजी बोलता है। प्रांतीय नेता के रूप में लालू प्रसाद पर आधारित उस चरित्र के जीवन के विरोधाभास, विडंबनाएं उपन्यास में उभर कर नहीं आती हैं। गोया गलत उच्चारण के साथ अंग्रेजी बोलना बहुत बड़ा दोष हो! हालांकि हाल के वर्षों में जिन दो भारतीय लेखकों को प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार मिले, उन दोनों के उपन्यासों की कहानी का संबंध भारतीय समाज के ऐसे हिस्सों से था, जो या तो संकटग्रस्त रहे हैं या जिनको संकटग्रस्त माना जाता रहा है।

किरण देसाई के उपन्यास ‘इन्हेरिटेंस ऑफ लॉस’ की प्रेम कहानी गोरखालैंड आंदोलन की पृष्ठभूमि में चलती है तो अरविन्द अडिगा के उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ का नायक बिहारी है, जिसका होना ही देश के अनेक हिस्सों में हाल के वषों में संकट का कारण रहा है, लेकिन बेझिझक यह कहा जा सकता है कि इन उपन्यासों की कहानियां भी भारतीय समाज में गहरे धंसती नहीं हैं। वे समस्याओं को, संकटों को ऊपर-ऊपर छूकर निकल जाती हैं। 

इसके विपरीत, पाकिस्तानी लेखकों मोहसिन हामिद, मो. हनीफ आदि की सबसे बड़ी ताकत ही यही कही जा सकती है कि उनकी रचनाओं में पाकिस्तानी समाज के अंतर्विरोध बहुत विश्वसनीय तरीके से उभर कर आते हैं, अंधेरी सच्चाइयां सामने आती हैं। सामंती समाज, धार्मिक कट्टरता, तालिबान, राजनीतिक विडंबनाएं महिलाओं की बुरी अवस्था- सब मिलकर एक ऐसे कथालोक का निर्माण करते हैं, जिसमें 9/11 के बाद वेस्ट की दिलचस्पी बढ़ी है।

शायद इसी कारण, जैसे-जैसे वहां के समाज का संकट गहराता जा रहा है, पाकिस्तानी अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं की मांग बढ़ती जा रही है। कमोबेश अफगानिस्तान और बंगलादेश के अंग्रेजी लेखकों में बढ़ती दिलचस्पी का भी यही कारण है।

लेकिन पाकिस्तान के अंग्रेजी लेखक इस समय विश्व अंग्रेजी साहित्य के सबसे नए पोस्टर बॉय हैं। हाल में अंग्रेजी साहित्य में अनेक तरह के ट्रेंड सेट करने वाली पत्रिका ‘ग्रान्टा’ ने अपना अंक 112 पाकिस्तानी अंक संख्या लेखन पर एकाग्र किया। यही नहीं, दक्षिण एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार डीएससी साहित्यिक पुरस्कार का  50 हजार अमेरिकी डॉलर का पहला पुरस्कार भी एक पाकिस्तानी लेखक के उपन्यास को ही दिया गया। हर बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए किसी न किसी पाकिस्तानी लेखक के नाम की चर्चा होती है।

यह एक विडम्बना ही है कि भारत में अंग्रेजी साहित्य का आरंभ यथार्थवादी जीवन-कथाओं से हुआ था। मुल्कराज आनंद का उपन्यास ‘कुली’, अहमद अली का उपन्यास ‘ट्वाइलाइट इन देल्ही’, आर.के. नारायण का उपन्यास ‘स्वामी एंड हिज फ्रेंड्स’ आदि छोटे-छोटे समाजों की बड़ी कथाएं थीं, अपने समाज की जीवंत छवियों के साथ, परंतु अपने उत्थान के दौर में वह अपने समाज से दूर होता गया। पाकिस्तान के लेखकों के अंग्रेजी उपन्यासों में वहां का समाज धड़कता है।

मोहम्मद हनीफ ने जब उपन्यास ‘द केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैन्गोज’ की कथा का ताना-बाना तानाशाह जनरल जिया के शासनकाल और उसकी हत्या की गुत्थियों के इर्द-गिर्द बुना तो पाठकों ने उन्हें सच की तरह लिया। यही पाकिस्तान के अंग्रेजी लेखकों की सबसे बड़ी ताकत है- वे अपने समाज से जुड़े हुए लेखक हैं, और जिनके लेखन ने व्यापक स्तर पर पाठकों की दिलचस्पी वहां के समाज में पैदा की है। भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों का स्वर्ण युग बीत चुका है, पाकिस्तानी लेखकों का परचम फहराता दिखाई देने लगा है।

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