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अपनी जीत को सहेजना सीखिए

इस लेख को मैं पिछले हफ्ते लिखना चाहता था, पर यह सोचकर रुक गया कि चलो, इससे पहले यह देख लिया जाए कि पाकिस्तान पर भारत की ऐतिहासिक जीत की चालीसवीं वर्षगांठ को हम हिन्दुस्तानी कैसे मनाते हैं? उम्मीद के अनुरूप निराशा ही मिली।

भारतीयों पर आरोप लगता रहा है कि उनमें इतिहास बोध है ही नहीं। अक्सर इतिहासकार उदाहरण देते हैं कि ईसा से 326 बरस पहले सिकंदर आया था और 1962 में चीनी, परदेसियों से हम आम तौर हारते ही आए हैं। जब जीते भी तो विजय को स्थायी बनाने की कुव्वत हमारे अंदर नहीं रही। आपको भी याद होगा कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को 16 बार हराया था। 17वीं बार जब मध्य एशिया के इस लड़ाके ने चौहान पर धावा बोला, तो जीत उसकी हुई और उसने इस बहादुर राजपूत राजा का सिर कलम कर दिया। अगर पृथ्वीराज ने पहली जीत के साथ ही गौरी का गला काट दिया होता, तो न उन्हें पराभव देखना पड़ता और न ही उनके देश का इतना बड़ा नुकसान हुआ होता।

1971 की जीत इसी मायने में अभूतपूर्व थी। उसने न केवल पाकिस्तान को हराया, बल्कि एक नया इतिहास रच दिया। मैं आंकड़े पेश कर रहा हूं, गौर से पढ़िए, सीना चौड़ा हो जाएगा। जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के दस्तों के सामने ढाका के रेसकोर्स में 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी आर्मी के 54,154, नौसेना के 1,381, एयर फोर्स के 833 और अर्धसैनिक बलों के 22,000 जवानों ने आत्मसमर्पण किया था। इसके साथ अन्य सैन्य कर्मचारियों समेत 12,000 ऐसे लोग थे, जिनकी गिनती ‘सिविलियन्स’ में होती है। इस तरह कुल जमा 90,368 पाकिस्तानी बंदी बनाए गए थे।

मैं उन दिनों स्कूल का छात्र हुआ करता था। इलाहाबाद से फाफामऊ जाते समय दोनों ओर फौजी इलाका पड़ता है। हम बच्चों को वहां अक्सर पाकिस्तानी सैनिक कुछ काम करते हुए या वालीबॉल खेलते दिख जाते थे। वे दिन भुलाए नहीं भूलते। कहने को यह जंग बहुत लंबी नहीं खिंची, पर शूर-वीरता के इन तेरह दिनों ने दुनिया का नक्शा ही बदल दिया। हमारे पड़ोस में एक नए देश का उदय हुआ। अफसोस! हमने जैसे अपनी किसी पराजय से कुछ नहीं सीखा, उसी तरह इस अजीम जीत को भी भुला दिया।

पुरानी रवायत है। जंग मैदान में लड़ी जाती है, पर उनके फैसले बातचीत की टेबल पर होते हैं। दो जुलाई 1972 को शिमला में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। अपने आप में वह अनोखा दस्तावेज था। नई दिल्ली को उसकी शर्तों को सिरे तक पहुंचाने की कवायद जारी रखनी चाहिए थी। ऐसा नहीं हुआ। उधर पाकिस्तान में तख्ता पलट हुआ।
सेनाध्यक्ष नियाजी ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया। संसार के इतिहास में जनरल नियाजी जैसे धूर्त तानाशाह बहुत कम हुए हैं। फौज के अपने अनुभव से वह जान गए थे कि पाकिस्तान कभी भी सीधी लड़ाई में भारत से नहीं जीत सकता। उन्होंने पैंतरा बदल लिया। आईएसआई ने उन्हीं के समय में अभूतपूर्व ताकत अजिर्त की। नियाजी और उनके प्यादों ने ही पंजाब और कश्मीर में आतंक की फसल बोई। हम आज भी उनके बोए अंगारे काट रहे हैं।

ये आतंक और अलगाव बताते हैं कि हमारे हुक्मरानों को बजाय मदमस्त हो जाने के पाकिस्तान को हमेशा नियंत्रण में रखने की कवायद करनी चाहिए थी। हमें भूलना नहीं चाहिए था कि 1962 में चीन की सेना ने हमारी हजारों किलोमीटर जमीन कब्जा ली थी। पर जीत के बावजूद चीन चुप नहीं बैठा। वह लगातार कूटनीतिक स्तर पर हिन्दुस्तान के खिलाफ तरह-तरह की कोशिशें करता रहा। पाकिस्तान से उसकी साजिश भरी जुगलबंदी आज भी हमारे लिए सिरदर्द है।

भरोसा न हो तो पिछले कुछ साल के घटनाक्रम को देख लीजिए। 26/11 को मुंबई पर हमला हुआ। हमलावर पकड़ा गया। किसी को बताने की जरूरत नहीं कि वह पाकिस्तानी है। यह भी एक सच है कि कसाब की समूची ट्रेनिंग पाकिस्तानी सरजमीं पर ही हुई है। यही नहीं, उसके बाद की भी तमाम आतंकवादी गतिविधियों ने इस कड़वे सच को बार-बार हमारे सामने पेश किया।

यह ठीक है कि मौजूदा दुनिया नहीं चाहती कि दो परमाणविक देश लड़ें, परंतु यह तर्क हमेशा हत्यारों के बचाव की ढाल भी नहीं बन सकता। हमारे हुक्मरानों में जैसे देश की सुरक्षा को लेकर कोई जागरूकता ही नहीं थी। वर्ष 1977 में जब मोरारजी देसाई ने सत्ता संभाली, तो उन्होंने रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग) के ही पैर तोड़ दिए। यह कमजोर भारत का ऐसा मजबूत संगठन था, जिसने बांग्लादेश के सर्वप्रथम प्रधानमंत्री मुजीबुर्रहमान को पहले ही सचेत कर दिया था कि आपकी जान को खतरा है। कभी-कभी कुछ लम्हे खता करते हैं और सदियां सजा पाती हैं। हमारे सत्ता नायक पता नहीं खताएं करने के इतने अभ्यस्त क्यों हैं?

गई 16 तारीख को मैं दिन भर टेलीविजन पर न्यूज चैनल बदलता रहा। उम्मीद थी कि कुछ गंभीर देखने को मिलेगा, पर टोने-टोटके और ठुमकों के खिझाने वाले दृश्यों के अलावा कुछ नहीं हासिल हुआ। अन्ना हजारे के इर्द-गिर्द घूम रहे राजनीतिज्ञों को क्या दोष दें? खुद अन्ना भी इस मुद्दे पर मौनी बाबा बने रहे। वह खुद भारतीय सेना में रहे हैं और पाकिस्तान के खिलाफ एक जंग में भी शरीक हुए थे। और कुछ नहीं, तो सार्वजनिक तौर पर वह फौज के अपने उन साथियों को श्रद्धांजलि ही दे देते, जो देश की रक्षा करते हुए इस युद्ध में शहीद हुए थे।

इस दौर का एक और दुर्भाग्य है, बाजार की अर्थव्यवस्था ने जैसे तमाम मुल्कों की सरकारों को कॉरपोरेट घरानों में तब्दील कर दिया है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अक्सर खुद को राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कहलवाने की बजाय समूचे मुल्क का सीईओ कहलवाना पसंद करते हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ ने जब पाकिस्तान की कमान संभाली थी, तब उन्होंने भी कहा था कि मैं अपने देश का सीईओ हूं। खुद को समूचे पाकिस्तान का मुख्य कर्ता-धर्ता बताने वाला यह शख्स हम पर पहले कारगिल की लड़ाई थोप चुका था और पाकिस्तान की एक और पराजय के लिए जिम्मेदार था।

समय आ गया है, जब हमारे देश के सभी राजनीतिक दल संसद को ठप करने की बजाय उसे देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के लिए भी चलाएं। वे भूलें नहीं कि उनकी भी जान खतरे में पड़ सकती है। 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुए हमले ने इस सच को जगजाहिर कर दिया था। इसी हफ्ते उस हमले की दसवीं वर्षगांठ पर संसद की सुरक्षा की चर्चा तो बहुत हुई, पर बांग्लादेश की जीत की वर्षगांठ उपेक्षित ही छोड़ दी गई। क्या सांसदों को देश की सुरक्षा की उतनी चिंता नहीं है, जितनी होनी चाहिए? हम इतिहास से कब सीखना शुरू करेंगे?

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