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जहां टेक्नोक्रैट चाहिए, वहां नौकरशाह न हों

पहले कोंकण रेलवे और फिर दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन- देश की दो बड़ी रेल परियोजनाओं की कामयाबी का सेहरा उनके सिर बांधा जाता है। 79 साल के ई. श्रीधरन 31 दिसंबर को दिल्ली मेट्रो के मैनेजिंग डायरेक्टर पद से रिटायर हो रहे हैं। उन्होंने दिल्ली मेट्रो को जो स्तर और मॉडल दिया, उसे अब बंगलुरु से लेकर चंडीगढ़ तक सभी जगह अपनाया और दोहराया जा रहा है। श्रीधरन के अभी तक के कैरियर और उनकी आगे की योजनाओं पर उनसे बातचीत की प्रवीण प्रभाकर ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश:

रिटायरमेंट के बाद की क्या योजना है?
सोलह साल के लंबे कार्यकाल के बाद मैं दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से रिटायर हो रहा हूं। वैसे भी अगले जून में मैं 80 साल का हो जाऊंगा। वक्त आ गया है कि मैं खुद को पेशेवर कामकाज से दूर रखूं। रिटायर होने के बाद केरल लौट जाऊंगा। वहां मेरा पैतृक घर है। वहीं आध्यात्मिक कामकाज में मन लगाऊंगा। धर्म-अध्यात्म की किताबों को पढ़ंगा। इन दिनों मैं अपना मनभग्वद् गीता और श्रीमद् भागवत में लगा रहा हूं। अन्य धार्मिक ग्रंथों को भी पढ़ रहा हूं। स्वामी भूमानंद तीर्थजी के प्रवचनों का भी अध्ययन कर रहा हूं। खुद को दुरुस्त रखने के लिए मैं योग और ध्यान करता हूं, जिसे आगे भी जारी रखूंगा।

वर्षों तक दिल्ली मेट्रो से जुड़े रहने के बाद अलग हो रहे हैं। कैसा लग रहा है?
मैं बहुत खुश हूं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिल्ली मेट्रो की तरक्की के लिए मैंने कुछ काम किए। लेकिन रिटायरमेंट हर पेशेवर की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है, जो आता ही है। अब मैं भविष्य की तैयारियों में जुटा हूं। रिटायरमेंट के बाद का वक्त कैसे बीते, इस पर पूरा ध्यान है।

दिल्ली मेट्रो से जुड़ी आपकी सबसे खास याद क्या है?
दिल्ली मेट्रो से जुड़ा हर एक दिन मेरे लिए खास रहा है। इसलिए किसी एक संस्मरण को बताकर मैं दूसरे संस्मरणों की अहमियत कम नहीं करना चाहता। लेकिन साल 2002 में जब पहली बार मेट्रो रेल पटरी पर दौड़ी थी, उस वक्त को नहीं भूल सकता। तब पहली मेट्रो रेल सेवा को देखने के लिए हजारों लोग मेट्रो स्टेशन पर आए थे। उस पल को याद करके आज भी मैं गर्व महसूस करता हूं।

क्या मेट्रो की कामयाबी पहले की तरह ही अब भी पटरी पर रहेगी?
निस्संदेह। आज दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन कामयाब है, क्योंकि इस संस्थान से जुड़ा प्रत्येक कर्मचारी कड़ी मेहनत कर रहा है। वे अपने काम के प्रति समर्पित हैं। मेरी तो यह खुशकिस्मती रही कि मैंने ऐसे अच्छे कर्मचारियों से भरी टीम की अगुवाई की। इसलिए जब मैं इस संस्थान से विदा हो रहा हूं, तब भी मुझे भरोसा है कि दिल्ली मेट्रो अपनी क्षमता का सबसे अच्छा इस्तेमाल करते हुए लोगों की सेवा करती रहेगी। मेरे उत्तराधिकारी मंगू सिंह काफी सक्षम और पेशेवर व्यक्ति हैं।

भारतीय रेलवे, कोंकण रेलवे और दिल्ली मेट्रो आप तीनों से जुड़े रहे। इन तीनों की तुलना आप कैसे करते हैं?
तीनों की तुलना की ही नहीं जा सकती। करूं भी, तो यह उचित नहीं होगा, क्योंकि तीनों ही संस्थान एक-दूसरे से काफी अलग हैं। संरचना के आधार पर भी और कामकाज में भी। लेकिन तीनों जगह मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। प्रेरणाप्रद कार्यकाल रहे।

समय पर काम पूरा करने की संस्कृति आपने कैसे बनाई?
यह कहना बेबुनियाद है कि अपने यहां वक्त पर काम पूरे नहीं होते या वक्त पर काम पूरे नहीं किए जा सकते। बस हमें अपने काम के प्रति निष्ठा व लगाव बनाए रखने की जरूरत है। अगर हम बेवजह की लाल फीताशाही व समारोहों में रिबन काटने से दूर रहें, तो सब कुछ मुमकिन है। एक तथ्य और। भ्रष्टाचार का भी पूरी तरह से खात्मा जरूरी है। दिल्ली मेट्रो के निर्माण के दौरान मैंने शुरू से ही इन बातों का खयाल रखा। और नतीजा सबके सामने है।

पर किसमें ज्यादा मुश्किलें आईं, कोंकण रेलवे में या दिल्ली मेट्रो में?
दोनों ही प्रोजेक्ट मुश्किलों से भरे और चुनौतीपूर्ण थे। कोंकण रेल मार्ग तो उन जगहों पर बनाना था, जहां के रास्ते दुर्गम हैं। पहाड़ को काटकर उस पर सुरक्षित रेल मार्ग बनाना आसान नहीं था। लेकिन इसे मुमकिन बनाया गया। दूसरी तरफ, दिल्ली मेट्रो को संकीर्ण सड़कों व रिहाइशी इलाकों में तैयार करना था। ऐसे में कभी भी, कुछ भी हो सकता था।

दो बड़े हादसे तो हुए ही?
निश्चित तौर पर दोनों ही दुर्घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण रहीं। इससे मैं काफी आहत भी हुआ। हमें इन हादसों से उबरने में काफी वक्त लगा। लेकिन मैं इस बात से खुश हूं कि समय रहते हुए हम इस सदमे से निकलने में कामयाब रहे और मेट्रो का  निर्माण वक्त रहते पूरा हो गया।

क्या मेट्रो की कामयाबी को छोटे शहरों में भी भुनाया जा सकता है? क्या इससे सभी राज्यों को जोड़ सकते हैं?
मेट्रो रेल पूरी तरह से महानगरीय जीवनशैली में ही फिट है। इसकी सीमाएं भी हैं। खर्चें भी हैं। इसलिए मुझे लगता है कि इसे शहरी लोगों के परिवहन तंत्र के तौर पर ही देखा जाए। राज्यों को जोड़ने का खयाल त्याग देना ही बेहतर होगा।

क्या भारतीय रेल को मेट्रो की तरह बनाया जा सकता है?
भारतीय रेल की पहुंच देश के लगभग सभी हिस्सों तक है। यह बड़ी बात है। जहां तक व्यवस्थागत सुधार, हादसों को कम करने और इसे और उन्नत बनाने की बात है, तो मैं हमेशा से यही कहता आया हूं कि किसी भी संस्थान को उसके विशेषज्ञों के हवाले कर दें। सब ठीक हो जाएगा। जहां टेक्नोक्रैट की जरूरत है, वहां टेक्नोक्रैट हो। जहां नौकरशाहों की, वहां अफसर हो। मुझे लगता है कि मेट्रो निर्माण को पाठ्यक्रमों में डाला जाना चाहिए। इससे छात्र बहुत कुछ सीखेंगे।

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