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बिस्मिल आज भी जिंदा हैं यादों में

वक्त आने पर बता देंगे तुझे ऐ आसमान, हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश का ह्दय स्थली कहलाने वाले गोरखपुर को यह गर्व हासिल है कि स्वतंत्रता संग्राम में ना सिर्फ यह धरती चौरी चौरा कांड के महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ती है बल्कि इस सरजमीं को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की शहीद स्थली होने का भी गर्व प्राप्त है।

गोरखपुर जिला जेल में पंडित बिस्मिल को 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दी गई थी। इसी जेल में पंडित जवाहर लाल नेहरू को वर्ष 1942 में कैद किया गया था। गोरखपुर का घंटाघर बाजार जहां कभी पीपल का एक बड़ा वृक्ष हुआ करता था। पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर जिला जेल से राजघाट ले जाते समय बिस्मिल के शव को थोडी देर के लिए जनता दर्शन के लिए रखा गया था। अंग्रेजों के तमाम भय और आतंक को दरकिनार करते हुए विशाल जनसमूह भारत के इस अमर सपूत को आखिरी सलाम कहने के लिए उमड़ पडा था। गोरखपुर में कई ऐसे लोग आज भी जीवित हैं। जिन्होंने यह मंजर देखा था।
 
बिस्मिल की शहादत दिवस निकट आते ही लोगों को इस अमर शहीद की याद आने लगती है। जिला जेल हो या बिस्मिल पार्क अथवा घंटाघर हर जगह उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। पं. बिस्मिल के अंतिम दिनों का जेल वृतांत उन्होंने हिन्दी समाचार पत्र (स्वदेश) में लिखा था। उससे साफ जाहिर है कि युवा पीढी को खामोश देखकर वह चिंतित थे। उनके सामने अंग्रेजों ने बहुत कुछ पेश किया ताकि वह स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते से हट जाएं लेकिन वह टस से मस नहीं हुए।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिला जेल में स्थित पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की समाधि पर आज भी शहादत दिवस पर मेले का दृश्य नजर आता है। काकोरी कांड को लेकर आजादी के इस महान सिपाही को 19 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर जिला जेल में फांसी पर लटका दिया गया था। आजादी के इस महान सपूत को श्रद्धाजंलि देने के लिए लोंगों की भीड़ जुटती है और आजादी के तराने गाए जाते हैं।

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