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2012 में निगाहें निर्देशकों पर

कैमरे के पीछे कड़ा मुकाबला
बॉलीवुड में सफल निर्देशकों की एक लंबी चौड़ी फौज है। संजय लीला भंसाली, मधुर भंडारकर, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, विधु विनोद चोपड़ा, विशाल भारद्वाज, अनुराग बसु व अनुराग कश्यप, फरहान अख्तर जैसे निर्देशक कुछ हटकर फिल्में बनाते हुए अपनी पहचान लगातार मजबूत ही करते जा रहे हैं। इन्हीं स्थापित निर्देशकों की टोली में शामिल होने के लिए कुछ नए निर्देशकों ने भी कमर कस ली है।

इंडस्ट्री के दिग्गज निर्देशकों का मानना है कि तमाम नए निर्देशकों में जोया अख्तर शायद सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली नजर आती हैं। उनकी दो फिल्में लक बाय चांस और जिंदगी मिलेगी ना दोबारा इंडस्ट्री को काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।

तो दूसरी ओर निर्देशन के क्षेत्र में फिल्मकार रवि राय के भाई आनंद राय ने भी जरूर संभावनाएं दिखायी हैं। आनंद राय की फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ ने न सिर्फ सफलता दर्ज करायी, बल्कि आर.माधवन और कंगना राणावत के अभिनय के अलग रूप को भी परदे पर पेश किया। उम्मीद है कि 2012 में आनंद राय बतौर निर्देशक स्टार का दर्जा हासिल कर सकते हैं। 2010 में आयी फिल्म ‘दबंग’ से चर्चा में आये निर्देशक अभिनव कश्यप तेज बारिश का बुलबुला नजर आ रहे हैं। 2011 में उनकी कोई फिल्म शुरू नहीं हो पायी। यहां तक कि ‘दबंग 2’ के भी निर्देशक भी वह नहीं हैं।

‘दबंग’की सफलता का श्रेय निर्देशक के रूप में अभिनव कश्यप को जितना मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाया। कुछ लोगों ने कहा की फिल्म की सफलता में सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, सोनू सूद के अभिनय के साथ साथ फिल्म के गानों का बहुत बड़ा योगदान रहा, तो वहीं कुछ लोग यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि ‘दबंग’ में अभिनव कश्यप की मौलिक कहानी को ही खान बंधुओं ने बदल दिया था। इसके अलावा नए कलाकारों से सजी फिल्म ‘बबलगम’ से संजीवन लाल ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा, पर इस फिल्म का कुछ हुआ नहीं। लेकिन निर्देशक व लेखक के तौर पर संजीवन लाल में संभानाएं नजर आयीं।

यशराज बैनर के साथ जुड़े हुए मनीष शर्मा ने ‘बैंड बाजा बारात’ के निर्देशन के साथ स्वतंत्र निर्देशक के रूप में अपनी एक पहचान बनायी थी। पर इस फिल्म की सफलता के साथ ही वह इस कदर अहम के शिकार हुए कि अपने आपको ही सर्वज्ञाता मानने लगे और उन्होंने अपने करियर की दूसरी फिल्म ‘लेडीज वर्सेस रिक्की बहल’ को डुबा दिया। एक निर्देशक के तौर पर मनीष शर्मा से उम्मीदें की जा सकती हैं, पर यह तभी संभव हैं,जब वह जमीन पर रह कर काम करें।

2011 में नवोदित निर्देशकों की फिल्मों को देखने के बाद एक बात साफ तौर पर उभरकर आती है कि निर्देशक के तौर पर अब बॉलीवुड में वही निर्देशक सफल हो सकता है, जो सिनेमा की चिरपरिचित शैली से हटकर कुछ नया और मनोरंजन के साथ प्रधान फिल्म परदे पर लाने की कोशिश करेगा। इस सोच पर ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ के निर्देशक अली अब्बास जाफर काफी खरे उतरते हैं। यदि आने वाले वक्त में अली अब्बास जाफर को कारपोरेट घराने का सपोर्ट मिला, तो वह अनुराग कश्यप, अनुराग बसु और विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशकों के लिए भी खतरे की घंटी बन सकते हैं।

सफल अभिनेता अच्छा निर्देशक नहीं
मशहूर अभिनेता पंकज कपूर ने पहली बार अपने बेटे शाहिद कपूर और सोनम को लेकर फिल्म ‘मौसम’ के साथ निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा और इतनी बुरी फिल्म बनायी कि लोगों ने तोबा कर ली। एक बार फिर इस बात पर मुहर लग गयी कि अभिनय के क्षेत्र में नाम कमाने वाला कलाकार निर्देशन के क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता।

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