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क्यों हो रही है संसद की अवमानना

मौजूदा सत्र के दौरान संसद लगातार कई दिनों तक काम नहीं कर सकी। इसको लेकर ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि विपक्ष संसद की कार्यवाही में बाधा डालने पर आमादा है, ताकि वह सरकार तथा संसद के कामकाज को पंगु करने का अपना लक्ष्य हासिल कर सके। प्रचार के इस पर्दे के पीछे छिपा असुविधाजनक सच इसके बावजूद अपनी झलक दिखा ही देता है।

सच यह है कि सत्ताधारी कांग्रेस और उसकी यूपीए सरकार संसदीय जनतंत्र के सिद्धांतों के हिसाब से चलने के लिए तैयार ही नहीं हैं। संसद का सामान्य जनतांत्रिक तरीके से अपना कामकाज करना, उन्हें वास्तव में अपने रास्ते में बाधक दिखाई देता है, क्योंकि यूपीए को संसद के दोनों सदनों में सुरक्षित बहुमत हासिल नहीं है।

मिसाल के तौर पर, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मल्टी-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के फैसले की घोषणा की थी। जब विपक्ष ने इसका प्रयास किया कि संसद में इस मुद्दे को उठाया जाए और इस तरह की नीति को संसद से निरस्त कराया जाए, तो सरकार ने इस मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव स्वीकार करने से इनकार कर दिया। ठीक है, स्थगन प्रस्ताव स्वीकार करने का निर्णय स्पीकर द्वारा लिया जाता है, लेकिन यह सभी जानते हैं कि स्थगन प्रस्ताव का स्वीकार किया जाना सरकार के रुख पर ही निर्भर करता है। यूपीए के घटकों में तृणमूल कांग्रेस तथा द्रमुक की ओर से इस नीति का विरोध हो रहा था।

सरकार को इस बात का भरोसा भी नहीं था कि वह बसपा व सपा जैसी पार्टियों को इस मामले में तटस्थ करने में कामयाब हो जाएगी। वह ऐसे प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार ही नहीं थी, जिसका समापन उसकी निंदा पर हो। इसीलिए संसद की कार्यवाही ठप रही।

इस प्रक्रिया में कुछ कांग्रेसी मंत्रियों की ओर से कुछ निर्थक दलीलें भी पेश की गईं। इनमें एक दलील यह थी कि इस तरह का नीतिगत निर्णय तो कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे निर्णय को संसद में मतदान की प्रक्रिया से गुजारना कार्यपालिका के वैध अधिकार का ही अतिक्रमण करना होगा।

निस्संदेह, यह माना जा सकता है कि कार्यपालिका को कुछ नीतिगत मामलों में निर्णय लेने का अधिकार है। पर इस तरह के निर्णयों की पड़ताल करने और वोट के जरिये ऐसे फैसले को पलटवाने के संसद के अधिकार को कोई पार्टी या सरकार कैसे नकार सकती है? यह तो हमारी संसदीय राजनीतिक व्यवस्था में निहित संसद के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ जाना है।

एक के बाद दूसरे न जाने कितने देशों में यह देखने को मिला है कि सत्ताधारी वर्ग के हितों के लिए काम करने वाली सरकारें संसद के दायरे को संकुचित किए जाने तथा उसकी शक्तियों को कमजोर करने की कोशिशें करती हैं। जब तक संसद नव-उदारवादी नीतियों पर वफादारी से ठप्पा मारती रहती है और जनतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाए जाने तथा जनता के जीवन व आजीविका पर हमलों के जन-विरोध को स्वर नहीं देती है, तब तक तो संसदीय तौर-तरीकों को स्वीकार किया जाता है।

लेकिन जहां कभी किसी देश की संसद ने वित्तीय पूंजी की लुटेरी मांगों तथा नव-उदारवादी नीतियों के तकाजों को पूरा करने में असमर्थता दिखानी शुरू की, वहीं से इन निर्वाचित सदनों के पर कतरने और उन्हें झुकाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।

यूरोपीय संघ के देशों तथा यूरो-जोन को अपने जबड़ों में दबाए मौजूदा संकट के बीच पूरी दुनिया ने देखा है कि किस तरह खर्चें घटाने की मांग की जा रही है और रोजगार कम करने तथा जनता की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं में कतर-ब्योंत को थोपा जा रहा है। ग्रीस के प्रधानमंत्री द्वारा इन नीतियों पर जनमत संग्रह कराने का जिक्र करते ही यूरोपीय संघ के राजनीतिक नेताओं तथा बैंकरों ने हंगामा खड़ा कर दिया था।

वास्तव में, प्रधानमंत्री पापेंद्रू को इस्तीफा देना पड़ा और पापेडेमस नाम के एक बैंकर को कम्युनिस्टों को छोड़ दूसरी सभी पार्टियों की सहमति से प्रधानमंत्री का पद सौंप दिया गया। इस नई सरकार को खर्च घटाने वाली उन नीतियों को लागू करने का जिम्मा सौंपा गया है, जिनकी ताकीद यूरोपीय संघ तथा बैंकरों द्वारा किया जा रही है।

इसी तरह, इटली में दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री बलरुस्कोनी को शेयर बाजारों द्वारा उनके नेतृत्व में अविश्वास जताए जाने के बाद पद छोड़ना पड़ा है। उनकी जगह पर अर्थशास्त्री मारियो मोंटी को लाया गया है, जिनकी पीठ पर बड़ी पूंजी और यूरोपीय यूनियन के वित्तीय हलकों का हाथ है। इटली के राष्ट्रपति ने उन्हें आजीवन सीनेटर (ऊपरी सदन का सदस्य) नामित किया था, ताकि वह प्रधानमंत्री बन सकें।

इस मामले में राजनीतिक पार्टियों के विभाजनों से परे उन्हें राजकोषीय अनुशासन तथा कमखर्ची के कदम थोपने के काम सौंपे गए हैं। इस काम को एक ऐसी टेक्नोक्रेट की सरकार को पूरा करना है, जिसे इटली की जनता से किसी तरह का जनादेश नहीं मिला है। निर्वाचित सांसदों की अब सिर्फ इन नीतियों पर ठप्पा मारने की भूमिका रह गई है। जाहिर है कि बड़े पूंजीपतियों को भारत में भी ऐसी व्यवस्था कायम होते देखकर बहुत खुशी होगी।

भारत में यूपीए सरकार लोकसभा में अपने कमजोर तथा अनिश्चित बहुमत के बावजूद, नव-उदारवादी नीतियों व कदमों को थोपने की कोशिशों में लगी हुई है। कांग्रेस पार्टी, जो इस तरह से संसद की अवमानना कर रही है और संसद की सर्वोच्चता की दुहाई दे रही है, ताकि संसद के बाहर अपनी नीतियों के हरेक विरोध को इस लाठी से पीट सके।

लोकपाल संस्था के लिए सरकारी विधेयक के संसद में पेश किए जाने के बाद कांग्रेस के नेताओं ने यह ऐलान कर दिया कि उक्त विधेयक के खिलाफ आवाज उठाना ही अलोकतांत्रिक है, क्योंकि मामला संसद में विचाराधीन है। सरकार का ताजातरीन रुख यह है कि चूंकि इस विधेयक पर स्थायी समिति की रिपोर्ट पेश होने के बाद अब संसद में इस विधेयक पर चर्चा होनी है, इसलिए संसद से बाहर जंतर-मंतर पर या अन्य कहीं भी जनसभाओं में इस पर बहस नहीं होनी चाहिए।

लेकिन कांग्रेसी नेताओं के ऐसे तर्को से प्रभावित होने वाले बहुत कम ही होंगे।
कांग्रेसी नेताओं का ‘संसद की सर्वोच्चता’ का जाप लगातार तेज होता जा रहा है, लेकिन यह जाप भी इस सच्चाई को छिपा नहीं सकता है कि वर्तमान सरकार ही संसद का सम्मान घटाने और जनता की आवाज सुनने से इनकार करने के लिए जिम्मेदार है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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