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अजी, आस्था को भी अस्थमा होता है

मैं यह पहले भी बता चुका हूं कि मेरी पत्नी सुबह-शाम कैलेंडर में छपी जिस देवी की पूजा करती है, वह दरअसल हेमामालिनी हैं दुर्गा के रूप में। आस्था इसी को कहते हैं। मैंने एक दफा अपने बेटे से पूछा, ‘बताओ, मुगले आजम कौन था?’ वह बोला, ‘पृथ्वीराज कपूर।’ सामान्य ज्ञान इसी को कहते हैं।

इसी संदर्भ में मैंने एक दिन योगिराज कृष्ण से पूछा, ‘हे, यदा-यदा हि धर्मस्य वाले भगवान, आप धरती पर क्यों नहीं आ रहे हैं?’ वह बोले, ‘अभी वहां जुर्म कम हैं।’ मैं बोला, ‘तो हर मुहल्ले में थाना खुलवा दूं क्या।’ वह बोले, ‘क्यों?’ मैंने कहा, ‘जुर्म बढ़ जाएंगे योगेश्वर।’ वह तड़ से मेरी मथुरा से द्वारिका भाग गए।

चुनावी दिनों में जब दो नेता समझौता करते हुए हाथ मिलाते हैं, तो वह भरत मिलाप नहीं होता। वह ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ होता है। मैं अब तक नहीं समझ पाया कि पहले मजबूरी महात्मा गांधी के नाम होती थी, वह अब मनमोहन सिंह के नाम क्यों है।

अब क्या बताऊं आपको, मेरा छोटा बेटा गुंडई करने लगा है। मैंने टोका, तो बोला, ‘पापा, मैं विधायक बनूंगा। मैं देश का भविष्य हूं।’ मुझे याद आया कि जब वह बहुत छोटा था, तब मेरी पीने-पिलाने की आदत पर उसने टोका था, ‘पापा, मेरे भविष्य के लिए मत पीजिए।’ मैं ठहरा सब चीजों में उसका बाप। झट से कहा, ‘बेटा, मैं तेरे भविष्य के लिए नहीं, अपने वर्तमान के लिए पीता हूं।’

मेरा बड़ा बेटा बचपन से झूठ बोलता था, आज सफल वकील है। तीसरा बेटा शुरू से निठल्ला था, सो कविता करने लगा। इधर रंगकर्मी भी हो गया है। चुनावों के दौरान प्रचार गीत और नारे लिखता है। सुबह कांग्रेस, दोपहर भाजपा, शाम बसपा और रात को सपा के लिए नुक्कड़ नाटक करता है। बीच में कोई निर्दलीय मिल गया, सो अलग। उसकी प्रेमिका का नाम क्रांति है। मां का नाम शांति।
अपनी-अपनी आस्था है। मैं भी मुर्गा नोचते हुए मेनका गांधी को याद करता हूं। मैं कभी भी तृप्ति से संतुष्ट नहीं होता। हमेशा मन में रहता है- बट, नेक्स्ट। क्षमा करें, मैं गंभीर हो रहा हूं। अत: व्यंग्य खतरे में है।
जो चुनाव में जीतेगा, कुछ न कुछ तो देगा ही। वैसे भी वासनाएं एज-ग्रुप नहीं देखतीं।
उर्मिल कुमार थपलियाल

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